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तोपखाने की ताकत

लंबे समय के बाद भारतीय सेना को ‘धनुष’ और ‘सारंग’ जैसी अत्याधुनिक तोपें मिलने जा रही हैं। इन तोपों का परीक्षण काफी समय से चल रहा था और हर स्तर पर ये खरी साबित हुई हैं। पिछले तीन दशक से थल सेना का तोपखाना एक तरह से खाली पड़ा था, जबकि देश की सुरक्षा के लिए ऐसी तोपों की जरूरत बढ़ती जा रही है। ऐसे में सेना को तोपों का बेड़ा मिलना रक्षा तंत्र को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है।

Author January 3, 2019 3:29 AM
धनुष को बोफर्स तोप की जगह और सारंग को रूसी एम-46 की जगह तैनात किया जाएगा।

 

लंबे समय के बाद भारतीय सेना को ‘धनुष’ और ‘सारंग’ जैसी अत्याधुनिक तोपें मिलने जा रही हैं। इन तोपों का परीक्षण काफी समय से चल रहा था और हर स्तर पर ये खरी साबित हुई हैं। पिछले तीन दशक से थल सेना का तोपखाना एक तरह से खाली पड़ा था, जबकि देश की सुरक्षा के लिए ऐसी तोपों की जरूरत बढ़ती जा रही है। ऐसे में सेना को तोपों का बेड़ा मिलना रक्षा तंत्र को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है। धनुष को बोफर्स की जगह और सारंग को रूसी एम-46 की जगह तैनात किया जाएगा। इससे थल सेना की ताकत में इजाफा होगा। धनुष और सारंग की खूबी यह है कि ये दोनों ही पूरी तरह से भारत में बनाई गई हैं। मेक इन इंडिया के तहत इन स्वदेशी तोपों के निर्माण से यह तो साबित हो ही गया है कि तोप और टैंक जैसे सैन्य सामान बनाने में भारत पूरी तरह सक्षम है और किसी देश का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा। अस्सी के दशक में भारत ने स्वीडन से बोफर्स तोपों का सौदा किया था और चार सौ से ज्यादा तोपें खरीदी गई थीं। लेकिन इस सौदे में दलाली के आरोपों के बाद और तोपें नहीं खरीदी गईं।

सेना तोपों का इस्तेमाल मैदान से लेकर पहाड़ी इलाकों तक में करती है। पिछले दो-तीन दशकों से सेना को जिस तरह के अत्याधुनिक साजो-सामान की जरूरत पड़ती रही है, बोफर्स और रूसी एम-46 तोपें उन जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही थीं। लेकिन अब धनुष और सारंग इस कमी को दूर करेंगी। धनुष की गिनती दुनिया की उन चंद तोपों में की जाती है जिनकी मारक क्षमता उल्लेखनीय है। यह बोफर्स से अठारह किलोमीटर ज्यादा मार कर पाने में कामयाब है। इसकी खूबी यह है कि एक मिनट में दो गोले दाग सकती है और लगातार दो घंटे तक काम कर सकती है। यह सियाचिन से लेकर पोकरण के रेगिस्तान तक हर मौसम में खरी उतरी है। फिलहाल पहले चरण में सेना को चार सौ चौदह तोपें मिलेंगी। जबकि सारंग की मारक क्षमता रूसी एम-46 के मुकाबले तो ज्यादा है ही, साथ ही पहाड़ी इलाकों में यह सत्तर डिग्री तक घूम सकती है। इस दृष्टि से पहाड़ी युद्ध क्षेत्रों में यह ज्यादा उपादेय साबित होगी।

भारत को पिछले कई दशकों से पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों से गंभीर रक्षा चुनौतियां मिलती रही हैं। दोनों देशों के साथ भारत को युद्धों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में यह जरूरी है कि सैन्य ताकत में भारत दोनों के मुकाबले कम न रहे। इसके लिए सेना को हमेशा नए हथियारों और साजो-सामान से लैस करते रहना होगा। लेकिन विडंबना यह रही है कि इस मामले में चीन और पाकिस्तान भारत से कहीं आगे हैं। बोफर्स तोपें तीस साल से भी पुरानी पड़ चुकी हैं। रूसी तोप तो 1968 से सेना के पास है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारी सेना कितना जोखिम उठाते हुए दुर्गम क्षेत्रों में ऐसे पुराने हथियारों के बल पर दुश्मन से लोहा लेती रही। सेना को सिर्फ तोपों की कमी नहीं, छोटे हथियारों तक की कमी से जूझना पड़ रहा है। जिन हथियारों की जरूरत आज से बीस साल पहले थी, वे उसके पास आज भी नहीं हैं। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट तक में हथियारों और गोला-बारूद की कमी का जिक्र होता रहा है। संसदीय समितियां तक हथियारों की कमी पर चिंता जाहिर कर चुकी हैं। ऐसे में रक्षा क्षेत्र में अगर मेक इन इंडिया का सपना साकार हो रहा है तो यह एक बड़ी उपलब्धि है।

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