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संपादकीय: हिंसा की जमीन

ऐसी घटनाएं पिछले कुछ सालों में ज्यादा बढ़ी हैं। कभी ‘गोरक्षक’ कानून-व्यवस्था को हाथ में लेते हैं और ‘गोतस्करों’ को ठिकाने लगा देते हैं तो कभी बच्चा चोरी के शक में अनजान व्यक्ति भीड़ का शिकार हो जाता है।

Author नई दिल्ली | August 29, 2019 1:40 AM
भीड़ की हिंसा के बाद मौजूदा कानूनों के तहत कार्रवाई हुई, लेकिन उसे ऐसी प्रवृत्ति पर लगाम लगाने से लेकर आरोपियों को सजा दिलाने तक के मामले में अपर्याप्त माना गया। (File Pic)

राजधानी दिल्ली सहित देश के अलग-अलग हिस्सों में मंगलवार को पीट-पीट कर मार डालने की जो दहला देने वाली घटनाएं सामने आर्इं, उनसे एक बार फिर यह सवाल उठा है कि आखिर लोग इतने असहिष्णु और हिंसक क्यों होते जा रहे हैं। किसी को बच्चा चोर समझ कर, तो किसी को डायन बता कर मार डालने की घटनाएं वाकई चिंताजनक हैं। पुरानी दिल्ली स्टेश्न के बाहर मंगलवार को एक मदरसे के शिक्षक को पटरी पर दुकान लगाने वाले कुछ दुकानदारों ने पीट-पीट कर मार डाला। बात सिर्फ इतनी थी कि इस शिक्षक ने हेडफोन उठा कर देखा और पसंद न आने पर खरीदने से इंकार कर दिया। इसी को लेकर विवाद हो गया, जो उनके लिए जानलेवा साबित हुआ। मुंबई में एक वृद्ध ठेले वाले को कुछ लोगों ने पीट-पीट कर इसलिए मार दिया कि उसने कुछ लोगों को वहां कचरा फेंकने से मना किया था। बिहार के नवादा जिले के एक गांव में एक वृद्ध महिला को डायन बता कर पीट-पीट कर मार डाला गया। इसी तरह उत्तर प्रदेश के संभल में भीड़ ने बच्चा चोर होने के शक में एक व्यक्ति की हत्या कर दी। ऐसे ही एक मामले में मेरठ में एक महिला को बांध कर पीटा गया। ये सारी घटनाएं बताती हैं कि देश में कैसा खौफनाक भीड़ तंत्र बन चुका है, जिसका कानून-व्यवस्था में न कोई भरोसा है, न ही उसका कोई खौफ।

ऐसी घटनाएं पिछले कुछ सालों में ज्यादा बढ़ी हैं। कभी ‘गोरक्षक’ कानून-व्यवस्था को हाथ में लेते हैं और ‘गोतस्करों’ को ठिकाने लगा देते हैं तो कभी बच्चा चोरी के शक में अनजान व्यक्ति भीड़ का शिकार हो जाता है। कई बार ऐसी घटनाएं धर्म-विशेष के लोगों के साथ हुई हैं, जिन्हें ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाने को मजबूर करते हुए पीट-पीट कर मार दिया गया। कुछ घटनाओं को लेकर तो कहा जा सकता है कि इन्हें अंजाम देने वाले किसी न किसी रूप में प्रेरित होकर ऐसा करते होंगे, लेकिन राजधानी दिल्ली में जिस मदरसे के शिक्षक को हेडफोन पर विवाद के कारण मार डाला गया, वह ज्यादा गंभीर चिंता का विषय है। इस घटना को अंजाम देने वालों ने जरा भी नहीं सोचा कि कुछ रुपए की चीज के पीछे वे एक व्यक्ति को जिस तरह मौत के घाट उतार रहे हैं उसका हश्र क्या हो सकता है। इस घटना से हर आदमी के भीतर यह खौफ पैदा होना स्वाभाविक है कि रास्ते चलते न जाने क्या विवाद हो जाए और लोग पीट-पीट कर मार डालें! ऐसी घटनाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण ही यही है कि लोगों में कानून-व्यवस्था का भय खत्म हो गया है। शायद वे जानते हैं कि पुलिस कुछ नहीं करेगी। इस घटना में भी पुलिस ने कुछ पटरी दुकानदारों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज कर लिया। हैरानी की बात है कि भीड़ भरे बाजार में किसी ने उस शिक्षक को बचाने की कोशिश भी नहीं की।

समाज में बढ़ती इस तरह की हिंसक प्रवृत्ति एक लोकतांत्रिक और सभ्य राष्ट्र के लिए शर्मनाक है। इस तरह की घटनाओं का ग्राफ जिस तेजी से बढ़ रहा है, उससे साफ है कि देश में कानून-व्यवस्था का कोई मतलब नहीं रह गया है। ऐसी घटनाएं पुलिस और समाज दोनों के लिए चुनौती बन गई हैं। ऐसे अपराधियों से निपटने के लिए कानून भी काफी हैं, लेकिन ठप तंत्र में सब बेअसर साबित हो रहे हैं।

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