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संपादकीय: अनदेखी की संहिता

पश्चिम बंगाल पुलिस को यह बात अच्छी तरह पता थी कि वहां भाजपा और तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच शुरू से टकराव का माहौल है। हर चरण के मतदान में हिंसक झड़पें देखी गईं। फिर भी जब भाजपा अध्यक्ष का रोड शो आयोजित किया गया।

Author May 17, 2019 12:51 AM
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी।

चुनावों में रोड शो का चलन धीरे-धीरे शक्ति प्रदर्शन के अवसर में बदलता गया है। इसके चलते कई बार दलों के बीच तीखी झड़प की स्थिति भी पैदा हो जाती है। इसका ताजा और अप्रिय उदाहरण कोलकाता में भाजपा अध्यक्ष के रोड शो के दौरान देखने को मिला। उसमें भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता आपस में भिड़ गए, हिंसक झड़पें हुर्इं और विद्यासागर की मूर्ति तक तोड़ डाली गई। इस घटना के बाद दोनों दल एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। इस प्रकरण में निर्वाचन आयोग की भूमिका एक बार फिर गंभीर रूप से प्रश्नांकित हुई है। हालांकि आयोग ने तत्काल निर्णय करते हुए चुनाव प्रचार को बीस घंटा पहले रोक दिया। राज्य के पुलिस महानिदेशक (सीआइडी) और गृह सचिव को तत्काल प्रभाव से हटा दिया। मगर फिर भी आयोग पर अंगुलियां उठनी बंद नहीं हुई हैं। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का इतिहास रहा है। वहां हर चुनाव के दौरान पार्टियों के कार्यकर्ता आपस में भिड़ते देखे जाते हैं, चाहे वह पंचायत स्तर का चुनाव ही क्यों न हो। इसी के मद्देनजर निर्वाचन आयोग ने इस बार वहां हर चरण में थोड़ी-थोड़ी सीटों के लिए मतदान कराने का खाका तैयार किया था। मगर वह हिंसा रोकने में कामयाब नहीं हो पाया है।

पश्चिम बंगाल पुलिस को यह बात अच्छी तरह पता थी कि वहां भाजपा और तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच शुरू से टकराव का माहौल है। हर चरण के मतदान में हिंसक झड़पें देखी गर्इं। फिर भी जब भाजपा अध्यक्ष का रोड शो आयोजित किया गया, तो उसने एहतियाती कदम उठाना जरूरी क्यों नहीं समझा। क्या उसे इस तरह की किसी झड़प का अंदेशा नहीं था? कैसे दोनों दलों के कार्यकर्ता इस कदर बेलगाम हो गए कि उन्हें संभालना पुलिस के वश की बात नहीं रह गई और वे मार-पीट, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने में कामयाब हो गए। ऐसे जुलूसों के लिए राजनीतिक दल पहले से मंजूरी लेते, पुलिस को अपने कार्यक्रम के बारे में सूचना देते हैं। उस आधार पर उसमें जुटने वाली भीड़ और जुलूस के दौरान संभावित गड़बड़ियों का अंदाजा लगाया जाता है। पुलिस इसका आकलन करने में कैसे विफल रही? इसकी जवाबदेही से पश्चिम बंगाल पुलिस बच नहीं सकती।

मगर दोनों राजनीतिक दल भी इस घटना के लिए एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा कर अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकते। चुनाव में अपने प्रतिपक्षी के आरोपों का मर्यादित ढंग से जवाब देना, उसकी कमियों को उजागर करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुसार गलत नहीं कहा जा सकता। मगर प्रतिद्वंद्वी को रोकने, दबाने या भयाक्रांत करने की मंशा से अपने कार्यकर्ताओं को बेलगाम छोड़ देना या हिंसा के लिए उकसाना किसी भी रूप में लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। आखिर कार्यकर्ताओं की ऐसी हरकतों पर राजनीतिक दलों की अंतिम जवाबदेही होती है। चुनाव के लिए बाकायदा आदर्श आचार संहिता है, जिसका पालन करना हर दल के लिए जरूरी होता है। मगर शायद राजनीतिक पार्टियों ने इस तकाजे को भुला दिया है। उसे याद कराते रहना आखिरकार निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है। समझना मुश्किल है कि कैसे राजनीतिक दल रोड शो के नाम पर शक्ति प्रदर्शन करने की छूट ले बैठे हैं, उसकी कोई मर्यादा क्यों नहीं रह गई है। फिर ऐसा क्यों हो चला है कि पार्टियों को निर्वाचन आायोग का कोई भय नहीं रहा। कोलकाता की घटना के बाद निर्वाचन आयोग की भूमिका गंभीर रूप से प्रश्नों के घेरे में आई है।

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