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संपादकीय: निजता पर नजर

इसमें कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल सबसे अहम है और इसकी चिंता प्राथमिक होनी चाहिए। अगर कोई व्यक्ति इसके खिलाफ गतिविधियों में लिप्त पाया जाता है तो उस पर नजर रखना और उस पर कार्रवाई करना शासन के लिए जरूरी है। लेकिन सवाल है कि एक लोकतंत्र में किसी सरकार के इन अधिकारों को क्या असीमित होना चाहिए! गुरुवार रात केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल पर अपने एक आदेश में केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाली दस एजेंसियों को देश में चलने वाले सभी कंप्यूटरों की जांच का अधिकार दिया है।

Author Published on: December 22, 2018 3:17 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

इसमें कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल सबसे अहम है और इसकी चिंता प्राथमिक होनी चाहिए। अगर कोई व्यक्ति इसके खिलाफ गतिविधियों में लिप्त पाया जाता है तो उस पर नजर रखना और उस पर कार्रवाई करना शासन के लिए जरूरी है। लेकिन सवाल है कि एक लोकतंत्र में किसी सरकार के इन अधिकारों को क्या असीमित होना चाहिए! गुरुवार रात केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल पर अपने एक आदेश में केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाली दस एजेंसियों को देश में चलने वाले सभी कंप्यूटरों की जांच का अधिकार दिया है। यानी अगर इन एजेंसियों को महज शक के आधार पर किसी व्यक्ति या संस्था के कंप्यूटर में मौजूद सामग्रियों को देखने या जांचने का अधिकार होगा। हालांकि सरकार की ओर से फिलहाल देश की सुरक्षा की दलील पर विशेष स्थितियों में ही यह कार्रवाई करने की बात कही जा रही है और बताया गया है कि इसका आम लोगों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन हमारे देश में पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियों के कामकाज का जो तौर-तरीका रहा है, उसमें यह समझना मुश्किल नहीं है कि इस अधिकार का जमीनी असर क्या हो सकता है। क्या इसका एक अर्थ यह नहीं है कि सरकार लोगों की निजी गतिविधियों को मनमानी निगरानी के दायरे में लाने जा रही है?

प्रथम दृष्टया इस आदेश के जो आशय निकल रहे हैं, उसमें यह कैसे सुनिश्चित होगा कि इसके जरिए देश के नागरिक अधिकारों और लोगों की निजी स्वतंत्रता को निशाना नहीं बनाया जाएगा? अगर फोन कॉल या कंप्यूटरों की जांच का आदेश जारी किया गया है तो वह किस तरह किसी व्यक्ति की जासूसी करने से अलग है? यह कैसे सुनिश्चित होगा कि जांच एजेंसियों को इस तरह के अधिकार देने के बाद इसका दुरुपयोग नहीं किया जाएगा? किसी व्यक्ति या संस्था की कोई गतिविधि संदिग्ध है या नहीं, इसे कौन परिभाषित करेगा? संभव है कि कुछ लोग ऐसे अवांछित कामों में लिप्त हों, जो सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव के लिहाज से बेहद संवेदनशील हों। मगर किसी आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति और सामान्य नागरिकों के साथ सरकार के बर्ताव में कोई फर्क होगा या नहीं? क्या मौजूदा नियम या कानून देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त लोगों के प्रति इस कदर लापरवाह हैं कि इसके लिए लोगों पर अप्रत्यक्ष निगरानी का आदेश जारी करना पड़ा? यही वजह है कि इस आदेश की खबर सामने आते ही लगभग सभी राजनीतिक दलों ने इसे चिंताजनक बताया और उनकी ओर से इस पर तीखा विरोध जताया गया है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने निजता को संविधान में दर्ज मौलिक अधिकार के रूप में मान कर इसके पक्ष में फैसला दिया था। इसके मद्देनजर इसकी क्या गारंटी है कि सरकार के ताजा आदेश से सुप्रीम कोर्ट के फैसले और नागरिकों के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं होगा? जॉर्ज आॅरवेल ने 1948 में समय से आगे की कल्पना पर आधारित एक किताब लिखी थी, जिसका शीर्षक था ‘1984’। उसमें यह बताया गया था कि राजसत्ता कैसे अपने नागरिकों पर नजर रखती है और उन्हें बुनियादी आजादी देने के पक्ष में नहीं है! किसी लोकतंत्र को तभी परिपक्व माना जाता है जब उसमें असहमति और अभिव्यक्ति को अधिकार की शक्ल में जगह मिलती है। लेकिन कई बार देश की सुरक्षा को सवाल बना कर नागरिकों को निगरानी के दायरे में रखने और इस तरह उनकी निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दमन की कोशिशें दुनिया भर में की जाती रही हैं। जबकि निजी राय, असहमति और अभिव्यक्ति किसी भी लोकतांत्रिक देश और समाज की खूबसूरती होती हैं और इन पर अंकुश लगाने की कोशिश लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है।

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