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संपादकीय: तबाही से सबक

बांध में दरार आना, दीवारों का ढहना, सड़कों का बड़े गड्ढों में तब्दील हो जाना, इमारतों पर खतरा, पुलों का ढहना- ये सब ऐसी घटनाएं हैं जिनसे एक सजग, जिम्मेदार सरकार और प्रशासन लोगों को बचा सकता है।

Author July 4, 2019 12:49 AM
मुंबई में बारिश जरूर थम गई है, पर हालात सामान्य नहीं हो सके हैं। जगह-जगह जलजमाव की स्थिति है। (फोटोः पीटीआई)

मुंबई में पिछले तीन दिनों के दौरान भारी बारिश से जो तबाही हुई है, वह कोई नई बात नहीं है। हर साल मानसून की बारिश में इमारतें ढहने के हादसे होते हैं, लोग मारे जाते हैं और घायल होते हैं। सड़कों परदो-तीन फुट तक पानी भर जाना आम है, रिहायशी इमारतों के भूतल पर बने घर डूब जाते हैं। नाले उफनते रहते हैं, पटरियां पानी में डूबी रहती हैं और लोकल ट्रेन के पहिए ठहर जाते हैं। हवाई अड्डे तक लबालब हो जाते हैं और उतरने के दौरान विमान के हवाई पट्टी से फिसल जाने जैसी घटनाएं हो जाती हैं। वर्षाजनित हादसे होते रहते हैं। जनजीवन एक तरह से ठप हो जाता है। मुंबई की यह कहानी हर साल की है। बारिश तो कहर बरपाती ही है, लेकिन उससे भी ज्यादा गंभीर बात है कि यह सब जानते-बूझते स्थानीय निकाय और सरकार पूरे साल ऐसा कोई बंदोबस्त नहीं करते जो लोगों को मरने से बचा सके। जाहिर है, भारी बारिश के कारण महानगर के जो हालात बिगड़ते हैं, उसके पीछे सरकार-प्रशासन की लापरवाही ज्यादा है। तब सवाल है कि मुंबई में बारिश से जो लोग मारे गए उसका दोषी कौन है, बारिश या वह प्रशासन जिसने तमाम चेतावनियों के बावजूद उन बस्तियों की सुध लेने की जरूरत नहीं समझी जहां ऐसे वर्षाजनित हादसे होने का खतरा बना रहता है! बारिश से मुंबई में ही नहीं, महाराष्ट्र के कई हिस्सों में हालात खराब हैं। पिछले तीन दिन में पैंतीस लोग मारे जा चुके हैं।

मुंबई के एक उपनगर में झोपड़पट्टियों पर एक दीवार गिरने से बाईस लोगों की मौत हो गई। पुणे और ठाणे जिले में भी दीवार गिरने के ऐसे ही हादसे हुए जिनमें कई लोग मारे गए। रत्नागिरि जिले के तिवारे बांध में दरार आ जाने से सात गांवों में पानी भर गया और तेईस लोगों की जान चली गई और कई लापता हैं। महाराष्ट्र खासतौर से मुंबई में, ये हादसे तब हुए हैं जब मौसम विभाग एक महीने पहले ही भारी बारिश को लेकर चेतावनी जारी कर चुका था। ऐसे में प्रशासन को हालात से निपटने के लिए जो बड़ी तैयारियां पहले कर लेनी चाहिए थीं, लगता है वे नहीं की गर्इं। कहा जा रहा है कि इस बार हालात इसलिए बिगड़े कि पानी खूब पड़ा। अब से पहले मुंबई में जुलाई 2005 में हालात बिगड़े थे और उससे पहले 1974 में। करीब साढ़े चार दशक बाद मुंबई में दो दिन के भीतर पांच सौ पचास मिलीमीटर बारिश हुई। इतनी ज्यादा बारिश के आगे महानगर पालिका के सारे इंतजाम ध्वस्त हो गए। ऐसा भी नहीं कि महानगर पालिका के पास पैसा नहीं हो, इसका बजट भारी-भरकम होता है। लेकिन वह भी भ्रष्टाचार की बीमारी से ग्रस्त है। बारिश भले कितनी हो, लेकिन सरकार और महानगर पालिका अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते!

बांध में दरार आना, दीवारों का ढहना, सड़कों का बड़े गड्ढों में तब्दील हो जाना, इमारतों पर खतरा, पुलों का ढहना- ये सब ऐसी घटनाएं हैं जिनसे एक सजग, जिम्मेदार सरकार और प्रशासन लोगों को बचा सकता है। रत्नागिरि के जिस बांध में दरार आई इसकी शिकायत काफी पहले की जा चुकी थी, और महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री ने खुद इस बात को स्वीकार भी किया है। लेकिन सरकार की लापरवाही ने लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया। मुंबई में हर साल पानी भरता है और फिर इस पर सत्तापक्ष और विपक्ष की राजनीति होती है, लेकिन नाले, सीवर, झोपड़पट्टियों की सुध कोई नहीं लेता। सवाल गरीब और आम आदमी के प्रति सरकार के सरोकार का है। अगर आमजन की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता हो और पिछली घटनाओं से सबक ले लिए जाएं तो लोगों को मरने से बचाना मुश्किल है क्या!

 

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