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संपादकीय: खुशी का सवाल

इस सूची में भारत पिछले साल के मुकाबले सात पायदान नीचे आ गया है और इस बार एक सौ चालीसवें स्थान पर है। पिछले साल एक सौ तेंतीसवे स्थान पर था। क्या यह हमारी सरकार के लिए शर्म की बात नहीं होनी चाहिए?

Author March 25, 2019 3:55 AM
चीन तिरानवे वें स्थान पर है।

भारत में लोग कितने खुश हैं, इसका पता हमें शायद नहीं होगा। अगर पता लगाने निकलें तो ऐसे लोगों की संख्या कम ही मिलेगी जो हर तरह से खुश या संतुष्ट नजर आएं। अधिसंख्य लोग जिनमें गरीब-अमीर दोनों शामिल हैं, कहीं न कहीं परेशान, हताश, पीड़ा में रहते हुए नजर आएंगे। गरीब अपनी वजहों से परेशान है तो अमीरों के अपने रोने हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि हमारी खुशी आखिर चली कहां गई। हम खुश नहीं हैं तो क्यों नहीं हैं? हाल में एक बार फिर दुनिया के पैमाने ने यह बताया है कि भारतीय खुश नहीं हैं और पिछले साल के मुकाबले खुशहाली के पायदान पर भारत और नीचे चला गया है। इसका मतलब यह है कि पिछले एक साल में ऐसा कुछ तो हुआ है जिससे लोगों की खुशी छिनी या कम हुई है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी- सस्टेनेबल डवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क ने खुशहाली को लेकर दुनिया के एक सौ छप्पन देशों की सूची जारी की है। इस सूची में भारत पिछले साल के मुकाबले सात पायदान नीचे आ गया है और इस बार एक सौ चालीसवें स्थान पर है। पिछले साल एक सौ तेंतीसवे स्थान पर था। क्या यह हमारी सरकार के लिए शर्म की बात नहीं होनी चाहिए?

सवाल है कि भारत के लोग खुशहाल क्यों नहीं हैं? खुशहाली की यह सूची कई मानकों के आधार पर तैयार की जाती है, जैसे- देश के प्रति व्यक्ति की जीडीपी, सामाजिक सहयोग, सामाजिक स्वतंत्रता, उदारता, भ्रष्टाचार और स्वास्थ्य व शिक्षा। जाहिर है, हम इनमें से किसी भी पैमाने पर खरे नहीं उतर रहे, बल्कि स्थिति और खराब हो रही है। पिछले साल के मुकाबले अगर भारत एक भी पायदान ऊपर चढ़ता तो माना जाता कि हालात सुधरने का संकेत दे रहे हैं। लेकिन इस बार का खुशहाली का पैमाना बता रहा है कि हम और बदतर स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। चौंकाने वाली बात तो यह है कि कंगाली का सामना कर रहा पाकिस्तान इस सूची में सड़सठवें स्थान पर है और बांग्लादेश एक सौ पच्चीसवें पर। चीन तिरानवे वें स्थान पर है। अमेरिका को देखें, तो वहां भी लोगों की खुशहाली में कमी आई है। जर्मनी, रूस, जापान जैसे देशों में स्थिति अच्छे संकेत नहीं दे रही।

सवाल भारत का है। खुशहाली के पैमाने पर भारत आज दुनिया के सबसे कम खुशहाल देशों जैसे- सीरिया, यमन, अफगानिस्तान, तंजानिया, रवांडा, सूडान आदि जैसे देशों के करीब है। हां, अगर भ्रष्टाचार, कुपोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की कमी की बात आती है तो हमारी स्थिति ऐसे पायदानों में ऊपर ही होती है। आज भारत में बेरोजगारी का ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा है। नौजवान पीढ़ी का बड़ा हिस्सा तनाव और अवसाद जैसी समस्याओं का शिकार हो रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम के दावे तो बहुत हो रहे हैं, लेकिन इनके नतीजे निराश करने वाले ही आ रहे हैं। बड़ी संख्या में शिशु और महिलाएं कुपोषण की शिकार हैं। बेघरों की तादाद का कोई आंकड़ा नहीं है। गरीबी दूर करने के नाम पर जो योजनाएं चलाई जाती रही हैं वे भ्रष्टाचार का शिकार हैं और इस कारण गरीबी उन्मूलन एक सपना ही रह गया। देश का अधिसंख्य किसान गंभीर संकट से जूझ रहा है और कर्ज से परेशान होकर जान देने की घटनाएं आम हैं। नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर सवाल उठते रहे हैं। प्रदूषण भारत के लिए बड़ी और गंभीर समस्या बन गया है और इसमें हमारी उपलब्धि यह है कि दुनिया के सबसे बीस प्रदूषित शहरों में पंद्रह भारत के हैं। जाहिर है, ऐसे में आम आदमी कैसे खुश रह सकता है!

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