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संपादकीय: घाटी में चुनाव

अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटने के बाद पूरे सूबे में कर्फ्यू लगा दिया गया था। सभी संचार सुविधाएं बंद थीं। विपक्षी नेताओं को उनके घरों से बाहर निकलने, राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने से रोक दिया गया था।

Author Published on: October 26, 2019 2:17 AM
उल्लेखनीय है कि इस चुनाव में नब्बे प्रतिशत से अधिक मतदान हुए।

जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा हटने के बाद पहली बार कोई चुनाव हुआ और उसमें जिस तरह लोगों ने उत्साहजनक हिस्सेदारी की, उससे वहां जल्दी ही अमन बहाली की उम्मीद जगती है। जम्मू-कश्मीर में प्रखंड विकास परिषद के चुनाव हुए। उसकी तीन सौ दस सीटों में से दो सौ सत्रह पर निर्दलीय प्रत्याशियों ने विजय हासिल की, जबकि इक्यासी पर भाजपा के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। उल्लेखनीय है कि इस चुनाव में नब्बे प्रतिशत से अधिक मतदान हुए। श्रीनगर में सौ फीसद मतदान हुआ। यह इस बात का संकेत है कि वहां के लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लौट रहे हैं। जब प्रखंड विकास परिषद चुनावों की घोषणा हुई, तब पीडीपी और नेशनल कान्फ्रेंस ने इसके बहिष्कार की घोषणा कर दी थी।

कांग्रेस ने चुनाव मैदान में उतरने की घोषणा की थी, मगर वह भी आखिरी दिनों में यह कह कर अलग हट गई कि घाटी में नेता नजरबंद हैं, इसलिए उसे चुनाव की तैयारियां करने का अपेक्षित समय नहीं मिल पाया है। इस तरह मैदान में अकेली भाजपा रह गई थी। उसके प्रत्याशियों के सामने बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में उतरे थे। स्वाभाविक ही जीतने वालों में निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या अधिक है। मगर इस चुनाव की अहमियत इस बात में नहीं है कि किस राजनीतिक दल ने कितनी कामयाबी हासिल की और किसे पटखनी खानी पड़ी। इसे जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली के तौर पर देखा जाना चाहिए।

अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटने के बाद पूरे सूबे में कर्फ्यू लगा दिया गया था। सभी संचार सुविधाएं बंद थीं। विपक्षी नेताओं को उनके घरों से बाहर निकलने, राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने से रोक दिया गया था। इसे लेकर विपक्षी दल लगातार संसद में और उसके बाहर सत्ता पक्ष पर हमलावर थे। उधर पाकिस्तान भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस फैसले को चुनौती दे रहा था। कर्फ्यू लंबा खिंचने लगा, तो आरोप लगाए जाने लगे कि सरकार घाटी के लोगों के मानवाधिकारों का हनन कर रही है। एक तरह से पूरी घाटी को जेलखाने में तब्दील कर दिया गया है। तब चरणबद्ध तरीके से जम्मू-कश्मीर से कर्फ्यू हटाने और विपक्षी नेताओं को रिहा करने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। प्रखंड विकास परिषद के चुनाव का एलान किया गया था। इस तरह इन चुनाव नतीजों ने एक तरह से विपक्षी दलों की इस दलील को खारिज कर दिया है कि घाटी में वैसी स्थिति नहीं है, जैसा वे प्रचारित कर रहे हैं। लोगों के मन में लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लौटने को लेकर उत्साह है।

इन चुनाव नतीजों से स्वाभाविक ही केंद्र सरकार को बल मिला है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जो प्रचारित किया जा रहा था कि कश्मीरी लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है, वह एक तरह से गलत साबित हुआ है। अब सरकार सप्रमाण कह सकेगी कि जब वहां के लोगों ने इतने उत्साह से चुनाव में शिरकत की, तो फिर उनके अधिकारों का किस तरह हनन हो रहा है। चुनाव लोगों के अपने मत व्यक्त करने का अवसर होते हैं। लंबे समय से हुर्रियत के नेता कश्मीरियों को चुनाव प्रक्रिया से दूर रहने की नसीहत देते रहे हैं। वे कश्मीर को अलग करने की मांग करते रहे हैं। सो, इन नतीजों से जाहिर हो गया है कि वहां के लोग इस बहकावे में नहीं आए हैं। इससे सरकार को घाटी में नए सिरे से विकास योजनाएं संचालित करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली में मदद मिलेगी।

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