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संपादकीय: भविष्य का बजट

जहां तक उद्योगों को बढ़ावा देने की बात है, बजट में नए कारोबारियों यानी स्टार्ट-अप शुरू करने वालों के लिए सरकार ने नरमी बरती है। ऐसे नए उद्यमियों से आयकर विभाग अब यह नहीं पूछ सकेगा कि उन्होंने काम शुरू करने के लिए पैसा कहां से जुटाया।

Author July 6, 2019 12:46 AM
संसद में शुक्रवार (पांच जुलाई, 2019) को केंद्रीय बजट पेश करने से पहले उसे लेकर जाती वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण। (फोटोः एपी)

देश का आम बजट जब आता है तो उस पर सबसे ज्यादा निगाहें आम आदमी की ही होती हैं। नौकरीपेशा लोगों से लेकर छोटे-मोटे कारोबारी और कामगार तक बजट से रियायतों और लाभों की उम्मीद लगाए होते हैं। इस लिहाज से देखें तो साल 2019-20 का आम बजट आमजन के बड़े हिस्से के लिए निराश करने वाला हो सकता है, क्योंकि न तो करों में कोई रियायतें हैं, न किसी छोटे-मोटे फायदे की गुंजाइश इसमें रखी गई है। लेकिन इस बार का बजट महत्त्वपूर्ण इस मायने में है कि इसमें दूरगामी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए बड़े और ठोस कदमों का एलान किया गया है। भले किसी को रेवड़ियां न बंटी हों, लेकिन अगले दस-बीस साल में देश को विकास के रास्ते पर कैसे ले जाना है, इसकी झलक बजट में साफ दिख रही है। सारा जोर विकास संबंधी योजनाओं पर दिया गया है ताकि देश को अगले पांच साल में पांच लाख करोड़ डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बनाया जा सके। जाहिर है, इस लक्ष्य को हासिल कर पाना कोई आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं।

आम बजट पेश करते हुए देश की पहली पूर्णकालिक महिला वित्तमंत्री ने विकास क्षेत्रों की जो प्राथमिकताएं रखी हैं, वे दीर्घकालिक और टिकाऊ विकास की तस्वीर को सामने लाती हैं। प्रस्तावित बजट में सरकार ने उद्योगों का खासतौर से खयाल रखा है। इस बार सरकार ने चार सौ करोड़ रुपए सालाना कारोबार वाली कंपनियों के लिए कंपनी कर की दर तीस से घटा कर पच्चीस फीसद करने का प्रस्ताव रखा है। यह बड़ा कदम है और देश की 99.3 फीसद कंपनियां पच्चीस फीसद कर दायरे में आ जाएंगी। कंपनियों की माली हालत सुधारने की दिशा में यह बड़ा प्रयास है। सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती राजस्व जुटाने की भी है। इसके लिए अमीरों की जेब पर हाथ डाला गया है। जिनकी आमदनी दो से पांच करोड़ रुपए सालाना है उन पर तीन फीसद और पांच करोड़ सालाना से ज्यादा आमदनी वालों पर सात फीसद का अधिभार और बढ़ाया है। बजट में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, औद्योगिक गलियारा परियोजना, भारतमाला और सागरमाला परियोजना, जल मार्ग विकास, देश के ज्यादातर शहरों को विमान सेवाओं से जोड़ने के लिए ढांचागत विकास परियोजनाओं पर अगले पांच साल में सौ लाख करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। बजट में बिजली से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा देने की दिशा में भी बड़े कदम उठाए गए हैं।

जहां तक उद्योगों को बढ़ावा देने की बात है, बजट में नए कारोबारियों यानी स्टार्ट-अप शुरू करने वालों के लिए सरकार ने नरमी बरती है। ऐसे नए उद्यमियों से आयकर विभाग अब यह नहीं पूछ सकेगा कि उन्होंने काम शुरू करने के लिए पैसा कहां से जुटाया। छोटे व्यापारियों और खुदरा कारोबार करने वालों को पेंशन का झुनझुना पकड़ाया गया है। यह पेंशन प्रधानमंत्री कर्मयोगी मानधन योजना से दी जाएगी। एफडीआइ के मामले में सरकार ने खुल कर उदारता दिखाई है। बीमा कंपनियों को सौ फीसद एफडीआइ की इजाजत दी गई है। मीडिया, नागरिक उड्डयन जैसे क्षेत्रों में भी विदेशी निवेश का रास्ता और आसान होगा। ये सारे कदम विकास की नई इबारत गढ़ने वाले बताए गए हैं। बजट में गांव, गरीब और किसान की भी चिंता दिखती है। पांच साल के भीतर सभी गांवों को सड़कों से जोड़ा जाना है। ग्रामीणों को बिजली, पानी, रसोई गैस जैसी सुविधाएं मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि ऐसे लक्ष्य हर बजट में होते हैं लेकिन भ्रष्टाचार के कारण ऐसी योजनाएं लक्ष्य हासिल नहीं कर पातीं। पिछले पांच साल में अर्थचक्र को जो रफ्तार मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिली। इसी का नतीजा आज सामने है कि दो साल में बेरोजगारी ने पिछले सारे रेकार्ड तोड़ दिए। बेरोजगारी कैसे दूर होगी, इसके प्रयास बजट में नहीं दिखते। बजट में जनता को सबसे बड़ा झटका तो पेट्रोल और डीजल पर अधिभार लगा कर दिया गया है जिसका तत्काल असर दिखेगा। र्इंधन महंगा होने का मतलब महंगाई का भूत फिर से सताएगा।

रेल बजट की बात करें तो इसमें सबसे ज्यादा जोर पीपीपी मॉडल यानी सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर है। अगले बारह साल में पचास लाख करोड़ के निवेश से जो परियोजनाएं शुरू की जाएंगी, वे पीपीपी मॉडल पर आधारित होंगी। इसके अलावा पहली बार ऐसा होगा जब रेलगाड़ियों का संचालन निजी क्षेत्र को सौंपा जाएगा। हालांकि प्रायोगिक तौर पर यह प्रयास सिर्फ पर्यटन वाले सीमित मार्गों पर होगा। अगर इसमें कामयाबी मिली तो रेलवे में निजीकरण का बड़ा दरवाजा खुल जाएगा और यात्री ही इसकी कीमत चुकाएंगे।

 

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