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संपादकीय: पर्यावरण की खातिर

इन दिनों स्पेन की राजधानी मेड्रिड में जलवायु संकट पर चल रहे सम्मेलन ‘कॉप 25’ में जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक (सीसीपीआइ) की जो रिपोर्ट जारी हुई है।

Author Updated: December 12, 2019 2:56 AM
जलवायु संकट को लेकर सजगता के मामले में भारत दुनिया के दस देशों में शुमार हो गया है।

वायु प्रदूषण के मामले में दुनिया के पैमाने पर भारत की स्थिति भले अच्छी न हो, लेकिन जलवायु संकट को लेकर सजगता के मामले में भारत दुनिया के दस देशों में शुमार हो गया है। इन दिनों स्पेन की राजधानी मेड्रिड में जलवायु संकट पर चल रहे सम्मेलन ‘कॉप 25’ में जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक (सीसीपीआइ) की जो रिपोर्ट जारी हुई है, उसमें भारत को उन पहले दस देशों में रखा गया है जो कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए तेजी से प्रयास कर रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि जलवायु संकट पर अब तक हुए वैश्विक सम्मेलनों में भारत ने जो प्रतिबद्धता जताई है, उस पर गंभीरता से काम हो रहा है और पेरिस समझौते व क्योटो समझौते पर अमल की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए हैं। धरती का जलवायु संकट अकेला भारत का खड़ा किया हुआ नहीं है, यह पूरी दुनिया के देशों, खासतौर से विकसित देशों के कृत्यों और लापरवाही का नतीजा है। इसलिए भारत चाह कर भी अकेला कुछ नहीं कर सकता और न ही अपने हितों की अनदेखी कर सकता है। संतोष की बात यह है कि जलवायु संकट से निपटने के लिए वैश्विक प्रयासों में भारत की जो भागीदारी है, उसमें हम ईमानदारी से काम कर रहे हैं और दुनिया ने इस बात को माना भी है।

सीसीपीआइ तैयार करते वक्त सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया जाता है कि संबंधित देश कोयले की खपत को कम करने सहित ऐसे क्या उपाय कर रहे हैं जिनसे जहरीली गैसों का उत्सर्जन न हो। भारत ने पिछले कुछ समय में इस दिशा में जो काम किया है वह उसके निर्धारित लक्ष्य से पंद्रह फीसद ज्यादा है। हालांकि वैश्विक स्तर पर देखें तो कोयले पर निर्भरता कम करने के लिए कई देशों ने गंभीरता दिखाई है। अब तक जो सत्तावन देश सबसे ज्यादा कार्बन उगल रहे थे, उनमें इकतीस देशों ने इसे कम करने के लिए दूसरे विकल्पों को तलाशना शुरू कर दिया है और ऐसे तरीके ईजाद किए हैं जिनसे कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है। हालांकि भारत सहित दूसरे विकासशील देशों के लिए यह कोई आसान काम नहीं है। भारत के लिए यह बहुत ही मुश्किल है कि कोयले के इस्तेमाल को एकदम से बंद कर दिए जाए। भारत में न सिर्फ घरेलू स्तर पर, बल्कि उद्योगों में भी बड़े पैमाने पर कोयले का उपयोग हो रहा है। बिजली उत्पादन तो एक तरह से कोयले पर ही निर्भर है। ग्रामीण इलाकों में आज भी र्इंधन रूप में कोयले और लकड़ी का इस्तेमाल हो रहा है। पर पिछले एक दशक में करोड़ों परिवारों पर गैस मुहैया करवा कर इस दिशा में बड़ा कदम उठाया है। सौर ऊर्जा के इस्तेमाल पर जोर दिया है। अगले तीन साल में चालीस फीसद बिजली नए ऊर्जा स्रोतों से बनाने का लक्ष्य रखा है।

सवाल है कि दुनिया के अमीर देश क्या कर रहे हैं जलवायु संकट से निपटने के लिए। सीसीपीआइ की रिपोर्ट बता रही है कि कार्बन उत्सर्जन में कमी के प्रयासों में अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया, सऊदी अरब जैसे अमीर और ताकतवर देशों का रिकार्ड सबसे ज्यादा बदतर है। अमेरिका ने तो पेरिस समझौते से अपने को अलग ही कर लिया। जाहिर है, वह अपने हितों से कोई समझौता नहीं कर रहा। अब तक होता यही आया है कि दुनिया का पर्यावरण बिगाड़ने के लिए विकसित देश विकासशील देशों को ही निशाना बनाते आए हैं। ऐसे में भारत का रुख साफ है कि वह विकसित देशों के दबाव के आगे झुकेगा नहीं, लेकिन कार्बन उत्सर्जन में कमी के प्रयास जारी रखेगा। क्या यह अमेरिका जैसे देशों के लिए सबक नहीं है!

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