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संपादकीय: पर्यावरण के लिए

ग्रेटा थनबर्ग की तरह ही इस नन्हीं कार्यकर्ता ने भी मैड्रिड में चल रहे ‘कॉप- 25’ सम्मेलन में वैश्विक नेताओं से धरती, इंसानी नस्ल और उसके जैसे बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए बिना देर किए कार्रवाई करने का आग्रह किया।

Author Published on: December 14, 2019 2:31 AM
कंगुजम अब तक इक्कीस देशों में जलवायु परिवर्तन की समस्या पर अपनी बात रख चुकी हैं और उन्हें दक्षिणी गोलार्ध की ‘ग्रेटा थनबर्ग’ बताया जा रहा है।

करीब ढाई महीने पहले संयुक्त राष्ट्र में स्वीडन की एक सोलह साल की किशोरी ग्रेटा थनबर्ग ने जलवायु संकट पर अपनी तीखी राय जाहिर करते हुए पर्यावरण संरक्षण के मामले में महज औपचारिकता निभाने को लेकर दुनिया के तमाम देशों को कठघरे में खड़ा किया था। तब उनके सख्त तेवर की भी काफी चर्चा हुई थी। अब भारत में मणिपुर की आठ साल की नन्ही बच्ची लिसीप्रिया कंगुजम ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। ग्रेटा थनबर्ग की तरह ही इस नन्हीं कार्यकर्ता ने भी मैड्रिड में चल रहे ‘कॉप- 25’ सम्मेलन में वैश्विक नेताओं से धरती, इंसानी नस्ल और उसके जैसे बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए बिना देर किए कार्रवाई करने का आग्रह किया।

कंगुजम अब तक इक्कीस देशों में जलवायु परिवर्तन की समस्या पर अपनी बात रख चुकी हैं और उन्हें दक्षिणी गोलार्ध की ‘ग्रेटा थनबर्ग’ बताया जा रहा है। पर्यावरणविदों के बीच यह खास आकर्षण का विषय है कि इतनी कम उम्र में यह बच्ची पारिस्थितिकी संतुलन के मसले पर कितना सरोकार रखती है। लेकिन सच यह है कि अगर कोई संवेदनशील व्यक्ति अपने आसपास की आबोहवा पर नजर रखता है और उसमें हो रहे बदलावों को करीब से महसूस कर पाता है तो यह अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण बात है।

गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र में ग्रेटा थनबर्ग के साथ-साथ बारह देशों के पंद्रह अन्य युवा कार्यकर्ताओं ने भी पर्यावरण को बचाने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए जाने के लिए पांच देशों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। तब यह सवाल उठा था कि पिछले चार-पांच दशक से बढ़ते तापमान के मसले पर होने वाले वैश्विक सम्मेलनों में दुनिया भर के विशेषज्ञ और प्रतिनिधि आखिर किस तरह की कार्य-योजना पेश करते हैं कि अब तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो सकी। क्या इसी रुख के साथ पर्यावरण और पारिस्थितिकी के सामने खड़ी हो रही चुनौतियों का सामना किया जा सकेगा? सवाल है कि पर्यावरणविदों की राय जब सामने आती है तब दुनिया भर में इस पर चिंता जताई जाती है, लेकिन जब उससे बचने के उपायों की बात आती है, तब खासतौर पर वे देश क्यों अपने कदम पीछे खींच लेते हैं, जिन्हें सबसे ज्यादा जिम्मेदार माना जाता है। जाहिर है, यह मुख्य रूप से व्यवस्था का सवाल और इच्छाशक्ति के अभाव का मामला है।

इसलिए कंगुजम की यह बात महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि उसके जैसे नन्हे कार्यकर्ता व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं, ताकि जलवायु परिवर्तन का संकट दूर होने का रास्ता अपने आप तैयार हो जाए। लेकिन वैश्विक स्तर पर पारिस्थितिकी संतुलन और पर्यावरण संरक्षण के व्यापक सवालों पर केंद्रित अमूमन हर साल होने वाले सम्मेलनों के बावजूद हालत आखिर ऐसी क्यों है कि हर अगले वर्ष जलवायु के सामने खड़ी चुनौतियां गहरी होती जा रही हैं? दुनिया के जो देश कार्बन उत्सर्जन के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं, उन्हें अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं समझ में आ रही है और इस मसले पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का दबाव क्यों नहीं काम कर पा रहा है? क्यों ऐसी नौबत आई है कि अब नई पीढ़ी के कम उम्र के बच्चों की भी नजर इस समस्या पर जा रही है और वे न केवल खुद अपने स्तर पर काम कर रहे हैं, बल्कि दुनिया को आईना दिखा रहे हैं। दरअसल, पहले ग्रेटा थनबर्ग और अब लिसीप्रिया कंगुजम जैसी किशोर और युवा कार्यकर्ताओं ने अब तक के वैश्विक पहलकदमियों को कठघरे में खड़ा किया है कि क्या केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता जताने भर से पर्यावरण की गंभीर समस्याओं का समाधान निकाला जा सकेगा!

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