ताज़ा खबर
 

शान की सनक

किसी खुशी के मौके पर उत्साहित होना या नाचना-गाना एक स्वाभाविक गतिविधि है। लेकिन अगर इस क्रम में शान का दिखावा करने के लिए गोलीबारी शुरू कर दी जाए तो यह अपराध से कम नहीं है। हालत यह है कि कई लोग किसी भी उत्सव और जश्न के समय नशा करना और बेलगाम हरकतें करना अपने जश्न का हिस्सा मान लेते हैं।

Author January 3, 2019 3:37 AM
इसी फार्महाउस पर हुई वारदात। महिला आर्किटेक्‍ट अर्चना गुप्‍ता (इनसेट) (Photo : (Mahender Singh Manral)

किसी खुशी के मौके पर उत्साहित होना या नाचना-गाना एक स्वाभाविक गतिविधि है। लेकिन अगर इस क्रम में शान का दिखावा करने के लिए गोलीबारी शुरू कर दी जाए तो यह अपराध से कम नहीं है। हालत यह है कि कई लोग किसी भी उत्सव और जश्न के समय नशा करना और बेलगाम हरकतें करना अपने जश्न का हिस्सा मान लेते हैं। साल के पहले दिन अकेले दिल्ली में जश्न के शौक में गोली चलने की तीन घटनाएं ऐसी हुर्इं, जिनमें किसी के बेलगाम शौक की वजह से कहीं बच्चे की जान चली गई, तो कोई बुरी तरह घायल हो गया। दक्षिणी दिल्ली के फतेहपुर बेरी में स्थित बिहार के एक विधायक के फार्महाउस में सोमवार रात नए साल के जश्न में चल रही पार्टी में आई एक महिला तब गंभीर रूप से घायल हो गई, जब विधायक ने उत्साह में पिस्तौल से गोली चला दी। इसके अलावा, वेलकम इलाके में चल रही पार्टी के दौरान किसी के गोली चलाने से एक बच्चा बुरी तरह घायल हो गया। न्यू उस्मानपुर में तो इसी तरह की घटना में लगी गोली से एक बच्चे की मौत हो गई।

यह किस तरह का शौक है जिसकी आग गोली चलाने से बुझती है? क्या किसी व्यक्ति के भीतर रसूख और शान के प्रदर्शन की भूख इस कदर बेलगाम हो सकती है कि उसे इस बात का खयाल रखना भी जरूरी नहीं लगे कि उसकी हरकतों से लोगों की जान जा सकती है? आए दिन ऐसी खबरें आती रहती हैं जिनमें किसी बारात या फिर किसी धार्मिक त्योहार या यात्रा के दौरान भी लोग कई बार खतरनाक हथियार लहराते हुए चलते हैं। नाचने-गाने या पटाखे छोड़ने के बीच कई बार हवा में की गई गोलीबारी में किसी व्यक्ति को गोली लग जाती है और उसकी जान भी चली जाती है। इसी तरह, पर्व-त्योहार या सार्वजनिक उत्सवों के लिए आयोजित पार्टी में कुछ लोग शान बघारने के लिए बंदूक या पिस्तौल लहरा कर गोली चलाने लगते हैं। सवाल है कि अगर किसी व्यक्ति के शौक की वजह से दूसरों की जान चली जाती है तो उसे किस तरह एक अपराध को बढ़ावा देने वाली परंपरा के रूप में नहीं देखा जाए? यह सही है कि इस तरह के बर्ताव को समाज या शासन की स्वीकार्यता नहीं मिली हुई है। लेकिन इसके जोखिम के बावजूद समाज या शासन के स्तर पर विवाह, जश्न, त्योहार या यात्रा के मौके पर हथियार लहराने या चलाने वाले लोगों के खिलाफ ठोस आवाज या कार्रवाई देखने में नहीं आती।

यह समझना मुश्किल है कि खुशी मनाने या जताने के लिए लोगों को हथियारों का सहारा लेने की प्रेरणा कहां से मिलती है! यह किस तरह की मानसिकता है जिसमें उत्साह बेलगाम होकर हिंसक हो जाता है? क्या यह समाज के मानस और सोचने-समझने के तरीके में घुली सामंती मानसिकता है, जो हमेशा खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने के क्रम में अपनी हद का खयाल रखना नहीं सिखाती? गोली चला कर या हथियार लहरा कर खुशी या शान का प्रदर्शन करने को किस तरह एक सभ्य समाज के व्यवहार के रूप में देखा जा सकता है? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि किसी भी खुशी, त्योहार या समारोह में हथियारों का प्रदर्शन या उसका इस्तेमाल दरअसल व्यक्ति के भीतर गहरे पैठी हिंसक कुंठाओं की अभिव्यक्ति है। खुशी और उत्साह एक मनोभाव है और अगर इसका प्रसार सकारात्मक भाव पैदा करता है, तभी इसकी सार्थकता है। लेकिन अगर इसके प्रदर्शन से हिंसा या आक्रामकता का भाव पैदा होता है तो शायद हमारे ऐसे व्यवहार को सभ्य होने की कसौटी पर खरा उतरना अभी बाकी है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App