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संपादकीय: मौत के अस्पताल

इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जिस अस्पताल में लोग अपनी बीमारी का इलाज कराने या फिर जीवन बच सकने की उम्मीद में गए थे, वहां के प्रबंधन की घोर लापरवाही कई लोगों के लिए जानलेवा साबित हुई। मुंबई के अंधेरी इलाके में स्थित ईएसआइसी कामगार अस्पताल में अचानक लगी आग इतनी तेजी से फैली कि मरीजों और उनके तीमारदारों को भागने मौका तक नहीं मिला।

Author December 20, 2018 3:37 AM
अस्पताल में लगी आग से बचाने की कोशिश में जुटे लोग। (AP Photo)

इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जिस अस्पताल में लोग अपनी बीमारी का इलाज कराने या फिर जीवन बच सकने की उम्मीद में गए थे, वहां के प्रबंधन की घोर लापरवाही कई लोगों के लिए जानलेवा साबित हुई। मुंबई के अंधेरी इलाके में स्थित ईएसआइसी कामगार अस्पताल में अचानक लगी आग इतनी तेजी से फैली कि मरीजों और उनके तीमारदारों को भागने मौका तक नहीं मिला। नतीजतन, आग में गंभीर रूप से झुलस कर या फिर दम घुटने से आठ लोगों की मौत हो गई और करीब डेढ़ सौ लोग घायल हो गए। अगर मौके पर पर्याप्त संख्या में बचाव टीमें नहीं पहुंचतीं तो शायद हताहत होने वालों की तादाद और ज्यादा होती, क्योंकि उन टीमों के पहुंचने के बाद सौ से ज्यादा लोगों को जिंदा बचा लिया गया। अफसोसजनक यह है कि बचाव की फिक्र हादसा हो जाने बाद शुरू होती है। अगर आग लगने या दूसरे किसी भी हादसे की आशंका को ध्यान में रखते हुए बचाव के पर्याप्त इंतजाम रखे जाते तो शायद लोगों और खुद अस्पताल को इस तरह के जानलेवा हालात पैदा होने से नहीं गुजरना पड़ता। लेकिन अत्यंत सुरक्षित जगहों पर भी हादसों की आशंका के बने रहने के बावजूद बरती गई लापरवाहियों की वजह से उन तमाम लोगों को जान गंवानी पड़ती है, जिन्हें मामूली सावधानी बरत कर सुरक्षित बचाया जा सकता था।

इस तरह की तमाम घटनाओं के बाद सरकार की ओर से मृतकों के लिए मुआवजे की घोषणा की रस्मी कवायद से आगे क्या किया जाता है, उसके बारे में आम जनता को कुछ नहीं पता चल पाता। दावा जरूर किया जाता है कि आगे से सुरक्षा और बचाव के चौकस इंतजाम किए जाएंगे, लेकिन कुछ ही दिन बाद लोगों को कहीं ठीक इसी तरह के नए हादसे की खबर मिल जाती है। सवाल है कि अस्पतालों में बार-बार आग लगने की घटनाओं से कोई सबक क्यों नहीं लिया जाता है? मुंबई के अस्पताल में आग लगने की घटना की जांच के बाद उसके कारण सामने आएंगे। लेकिन फिलहाल सामने आए एक तथ्य से पता चलता है कि अस्पताल के प्रबंधन से लेकर बाकी संबंधित महकमों की निगाह में अस्पताल में इलाज और जीवन की भूख में पहुंचे लोगों की जान की कीमत क्या थी! गौरतलब है कि यह अस्पताल महज दो हफ्ते पहले ही आग से सुरक्षा के मानकों की जांच में नाकाम साबित हुआ था और इसके बावजूद अस्पताल की ओर से अनापत्ति प्रमाण-पत्र मांगा गया था। लेकिन अग्निशमन विभाग ने उस मांग को खारिज कर दिया था। खबरों को मुताबिक पिछले ग्यारह सालों से अब तक वहां फायर आॅडिट नहीं हुआ था।

अगर यह तथ्य है तो क्या अस्पताल को मरीजों और उनके परिजनों की जान से खिलवाड़ करने की छूट मिली हुई थी? हादसे के एक दिन बाद उसी अस्पताल के कर्मचारी सुविधाओं की कमी के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे और हादसे के लिए प्रशासन पर सवाल उठा रहे थे। यानी एक तरह आग लगने पूरी भूमिका पहले से बनी हुई थी और कोई एक मामूली कारण तात्कालिक बन गया। हालांकि इस हादसे की तकनीकी और फौरी वजह चाहे जो हो, लेकिन पहली नजर में यह सभी संबंधित महकमों और अफसरों की लापरवाही का नतीजा लगता है। जिस ईएसआइसी अस्पताल में यह दुर्घटना हुई, वह महाराष्ट्र औद्योगिक विकास कॉरपोरेशन के क्षेत्र में है और उसे राज्य और केंद्र सरकार तहत माना जाता है। इन सारे तथ्यों के आलोक में इस बात की जांच होनी चाहिए कि आग लगने या दूसरे हादसों से सुरक्षा इंतजामों को दुरुस्त रखना और आपात स्थिति में उसके इस्तेमाल को सुनिश्चित करना किसकी जिम्मेदारी थी।

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