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संपादकीय: उच्च शिक्षा की तस्वीर

यों शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक पदों पर नियुक्तियां करने से लेकर दूसरे मामलों में विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता हासिल है।

Author Published on: September 14, 2019 2:20 AM
सांकेतिक तस्वीर।

किसी भी देश की उच्च शिक्षा की तस्वीर यह बताती है कि वहां की सरकार की प्राथमिकता में शिक्षा की जगह क्या है और वह इससे कितना सरोकार रखती है। पिछले कई सालों से लगातार जब भी दुनिया भर में बेहतर गुणवत्ता वाले विश्वविद्यालयों की सूची सामने आई है, उसमें शीर्ष दो या ढाई सौ तक की संख्या में हमारे देश के किसी भी उच्च शैक्षिक संस्थान को जगह नहीं मिली। इस तरह की सूची सामने आने का एक हासिल यह होना चाहिए कि सरकार और समूची व्यवस्था इस मामले में सुधार के लिए ठोस पहलकदमी करे, ताकि इस स्थिति में कुछ सुधार हो। लेकिन अफसोस की बात यह है कि हर अगले साल इस मामले में भारत की तस्वीर और चिंताजनक होती गई है। कुछ साल पहले जहां विश्व भर में शीर्ष दो सौ विश्वविद्यालयों में भारत के किसी भी संस्थान को जगह नहीं मिल सकी थी, अब उसमें और ज्यादा गिरावट आ चुकी है। पिछले साल के आखिर में ढाई सौ और अब ताजा अध्ययन में तीन सौ विश्वविद्यालयों में भी हमारे देश का एक भी उच्च शिक्षा संस्थान अपनी जगह नहीं बना सका।

साफ है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में समस्या और उसके कारण स्पष्ट होने के बावजूद उसके हल के लिए कुछ भी ऐसा नहीं हो रहा है, जिससे भविष्य के लिए कोई उम्मीद बंध सके। सवाल है कि सरकारों की ओर से किए जाने वाले लगातार दावों के बावजूद आखिर इस मामले में तस्वीर और क्यों बिगड़ती जा रही है! आंकड़ों में विकास का पैमाना नापते हुए क्या यह ध्यान रखना जरूरी नहीं समझा जाता कि अगर सबसे अहम उच्च शिक्षा का क्षेत्र उपेक्षित रह जाता है, तो उस विकास की बुनियाद कितनी मजबूत होगी? लंबे समय से यह सवाल बना हुआ है कि शिक्षण के मामले में दयनीय हालत की सबसे बड़ी वजह शिक्षकों की भारी कमी है।

कुछ अन्य कारणों के अलावा सिर्फ इस वजह से पढ़ाई-लिखाई की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हो रही है, लेकिन इसके हल की कोशिशें केंद्र में नहीं आ पा रही हैं। थोड़ी बेहतर स्थिति इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी जैसे कुछ संस्थानों की मानी जाती है। लेकिन इससे इतर देश भर के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के खाली पदों की संख्या इतनी ज्यादा है कि इसके रहते बेहतर शिक्षण और शैक्षणिक गतिविधियों की उम्मीद बेमानी है।

यों शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक पदों पर नियुक्तियां करने से लेकर दूसरे मामलों में विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता हासिल है। लेकिन हाल के वर्षों में जब भी शिक्षकों की नियमित भर्ती का सवाल उठा तो धन की कमी सबसे मुख्य अड़चन बन कर सामने आई। दूसरे क्षेत्रों में धन के बेलगाम प्रवाह के बरक्स उच्च शिक्षा के मामले में धन की कमी कहां और किसकी ओर से पैदा हो रही है? यह किसी से छिपा नहीं है कि उच्च शिक्षा और उसके सहारे रोजगार के बीच बढ़ती खाई की वजह से हमारी शिक्षा व्यवस्था नए ‘ग्रेजुएट’ तो पैदा कर रही है, लेकिन रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है।

उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षण और शोध के मामले में जिस तरह की औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं, उनके रहते शैक्षणिक गुणवत्ता की किन कसौटियों को पूरा किया जा सकेगा? गौरतलब है कि संख्या के लिहाज से भारत की उच्चतर शिक्षा व्यवस्था अमेरिका और चीन के बाद तीसरे नंबर पर आती है, लेकिन गुणवत्ता के मामले में इसे दुनिया के शीर्ष तीन सौ विश्वविद्यालयों में भी जगह नहीं मिल पा रही है। यह समूचे देश के लिए चिंता की बात होनी चाहिए।

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