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संपादकीय: स्त्री का भय

हाल ही में हैदराबाद की घटना के अलावा ऐसी तमाम घटनाओं ने देश भर में लोगों के भीतर आक्रोश पैदा किया है।

Author Published on: December 3, 2019 2:25 AM
लगभग छियासी फीसद महिलाएं आसपास शराब या दूसरे नशीले पदार्थों की बिक्री से असुरक्षित महसूस करती हैं।

इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि हमारे देश में विकास के नारे के बीच बड़ी तादाद में महिलाएं खुद को, अमूमन हर जगह, असुरक्षित महसूस करती हैं। वे शायद ही कोई ऐसी जगह पाती हैं, जहां इस बात को लेकर आश्वस्त हों कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक घटना नहीं होगी। खासतौर पर वे यौन हिंसा की प्रकृति की घटनाओं के खौफ से लगातार खुद को घिरी पाती हैं। यों यह एक आम और त्रासद हकीकत है, जिस पर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति गौर कर सकता है, लेकिन अक्सर इस सामाजिक पहलू पर होने वाले अध्ययनों की रिपोर्टों में यही तथ्य उभर कर सामने आता है।

इसी क्रम में सामाजिक उद्यम ‘सेफ्टीपिन’, सरकारी संगठन कोरिया इंटरनेशनल कॉरपोरेशन एजेंसी और एक स्वयंसेवी संगठन एशिया फाउंडेशन के संयुक्त अध्ययन में एक बार फिर यही विडंबना दर्ज हुई है कि देश के कई शहरों में महिलाएं लगातार खुद को भयग्रस्त पाती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भोपाल, ग्वालियर और जोधपुर में करीब नब्बे फीसद महिलाएं सुनसान और खाली इलाकों की वजह से खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं। खासकर अविवाहित महिलाओं और छात्राओं को यौन हिंसा का खतरा ज्यादा है।

हालत यह है कि करीब दो तिहाई महिलाएं सार्वजनिक परिवहन की खाली या कम लोगों को ले जाती गाड़ियों में सफर करने से डरती हैं या सुरक्षा इंतजामों की कमी की वजह से वे लगातार एक आशंका से घिरी रहती हैं। लगभग छियासी फीसद महिलाएं आसपास शराब या दूसरे नशीले पदार्थों की बिक्री से असुरक्षित महसूस करती हैं। आखिरकार ये कमियां किसकी लापरवाही से मौजूद हैं? विचित्र है कि महिलाओं को घूरने, पीछा करने, फब्तियां कसने और गलत तरीके से छूने जैसी घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इन्हें यौन उत्पीड़न के मामलों में गंभीर प्रकृति का नहीं माना जाता है।

जबकि शुरुआती तौर पर घटने वाली ऐसी ही घटनाओं की अनदेखी और उनसे निपटने में बरती जाने वाली लापरवाही के बाद अपराधी प्रवृत्ति वालों का मनोबल बढ़ता है। यह बलात्कार या यौन हिंसा की बड़ी वजह है। इसके अलावा, घर की दहलीज से बाहर घटने वाली ऐसी घटनाओं के समांतर महिलाओं के लिए घर की चारदिवारी भी कितनी सुरक्षित है, यह सभी जानते हैं। इस मसले पर भी अनेक अध्ययनों में बताया गया है कि महिलाओं और बच्चियों के यौन उत्पीड़न के ज्यादातर मामलों में आरोपी उनका कोई परिचित, यहां तक कि संबंधी भी होता है।

हाल ही में हैदराबाद की घटना के अलावा ऐसी तमाम घटनाओं ने देश भर में लोगों के भीतर आक्रोश पैदा किया है। दूसरी ओर, सरकारें अक्सर यह दावा करती रहती हैं कि कानून-व्यवस्था और सुरक्षित माहौल मुहैया कराने के मोर्चे पर कोई कमी नहीं की जाती है। लेकिन अगर यह दावा सच है तो ऐसा क्यों है कि सौ में नब्बे महिलाओं को लगभग हर वक्त खौफ से गुजरना पड़ता है। सवाल है कि जब पितृसत्तात्मक मानसिकता से लैस पुरुषों का एक बड़ा हिस्सा अपनी यौन कुंठा की वजह से कभी भी यौन हिंसा या उत्पीड़न करने को तैयार रहता है, तो ऐसी स्थिति में महिलाएं खुद को कैसे सुरक्षित महसूस करें? निश्चित रूप से सख्त कानूनी व्यवस्था और समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया ऐसे अपराधों पर लगाम लगाने का एक सबसे जरूरी हिस्सा हैं। लेकिन जब तक सामाजिक विकास नीतियों और उनमें समाज को पितृसत्तात्मक मूल्यों से मुक्ति के सूत्रों को प्रमुखता नहीं दी जाएगी, तब तक स्त्री के लिए अपने आसपास की दुनिया खौफ ही पैदा करेगी।

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