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संपादकीय: जुर्माने का खौफ और सवाल

नए मोटर वाहन कानून का विरोध भले ही भारी जुर्माने के कारण किया जा रहा है, लेकिन सच यही है कि रोका उन्हें ही जाता है जो बिना हेलमेट या सीट बेल्ट के हों, लाल बत्ती पार करें, नंबर प्लेट सही न हो या ऐसी ही कोई खामी हो जो स्पष्ट दिखाई दे जाए। कायदे से इसमें उस एक अपराध का ही चालान होगा। लेकिन अगर ड्राइविंग लाइसेंस न हो, प्रदूषण प्रमाणपत्र न हो तो सबके चालान कटेंगे ही और निश्चित रूप से यह ज्यादा होगा।

Author Published on: September 19, 2019 3:31 AM
फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस।

संजय कुमार सिंह

नए मोटर वाहन कानून में भारी जुर्माने की धाराओं को लेकर इन दिनों काफी शोर और विवाद मचा हुआ है। भारी जुर्माने से यातायात नियमों के उल्लंघन को कम करने की कोशिश केंद्र सरकार का एक स्वागतयोग्य कदम है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि यातायात के नियमों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए और इससे दुर्घटनाएं होती हैं, लोगों की जान जाती है। इसे रोकने के कई तरीके हो सकते हैं। भारी जुर्माना इनमें एक है। यह कारगर है या नहीं और कोई दूसरा विकल्प है या नहीं, ये अलग मुद्दे हैं। अभी मुद्दा यह हो गया है कि इस नियम को कायदे से लागू कैसे किया जाए और विरोध से कैसे निपटा जाए। वैसे तो इन और ऐसी सारी बातों का ख्याल पहले रखा जाना चाहिए था।

हो सकता है रखा भी गया हो, लेकिन केंद्र सरकार की इस पहल पर राजनीति शुरू हो गई है। इसका पहला नुकसान यह होगा कि इससे नियमों की गंभीरता कम हो जाएगी और दूसरा यह कि इन्हें लागू करने की इच्छा और इनसे डर, दोनों ही कम हो जाएगा। इससे इस कानून के उद्देश्य की पूर्ति मुश्किल हो जाएगी। इसका कारण यह है कि अचानक जुर्माने की राशि बहुत ज्यादा बढ़ा दिए जाने के साथ-साथ कुछ ऐसे नियम बनाए गए हैं जिनका कोई मतलब नहीं है, अटपटे हैं या बेवजह हैं, जबकि दूसरी ओर कई मामलों में नियम ही नहीं हैं। उदाहरण के लिए, दुपहिया वाहनों पर गोद के बच्चे के बारे में कोई नियम नहीं है, सड़कों पर गड्ढे और होर्डिंग आदि से होने वाली दुर्घटनाओं का जिक्र नहीं है जबकि लुंगी और चप्पल पहन कर गाड़ी चलाने पर जुर्माने की बात है।

नए मोटर वाहन कानून को लेकर आलोचना सिर्फ वाहन चालकों के जुर्माने तक ही सीमित नहीं है। जुर्माना भरने वाला आम जनता का बड़ा वर्ग सड़क सुरक्षा से जुड़े उन मुद्दों पर भी गौर करने की मांग कर रहा है जिनके प्रति हमारी सरकारें हमेशा से घोर लापरवाह रही हैं और इसी वजह से लाखों लोग सड़क हादसों का शिकार हो रहे हैं। एक तरफ नियमों के पालन की स्थिति यह है कि ट्रकों पर नंबर प्लेट तक साफ नहीं होतीं, तमाम वाहनों पर रिफ्लेक्टर तक नहीं हैं (और इन्हें जरूरी भी नहीं किया गया है), महानगरों में भी चौराहों पर यातायात देखने वाला कोई नहीं होता, लाल बत्तियां नहीं हैं, अगर हैं तो ज्यादातर जगहों पर खराब रहती हैं। दूसरी ओर सीट बेल्ट नहीं लगाने या हेलमेट नहीं पहनने पर जुर्माना है, जबकि मोहल्ले में चलाने या भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर जहां तेज चल ही नहीं सकते, वहां इनमें रियायत दी जा सकती थी। छोटे शहरों में आमतौर पर यातायात सिपाही नहीं होता है और वित्त वर्ष के अंत में जब कोटा पूरा करना होता है तो मोहल्लों में चेकिंग शुरू हो जाती है। यह ऐसा मामला है जो नुकसान तो पूरा करता है पर लाभ कोई नहीं होता।

जुर्माना लाख बढ़ा दिया जाए, लेकिन जब तक कोई देखने वाला ही नहीं होगा और लोगों को पता होगा तो कोई क्यों डरेगा। एक दिन की जांच से वसूली का लक्ष्य भले पूरा हो जाए, लेकिन अगले दिन वही हाल हो जाएगा। लेकिन सबसे गंभीर बात तो यह है कि नई आ रही गाड़ियों में बिना टेलीफोन को हाथ लगाए बात करने की सुविधा है। गाड़ी चलाते हुए आप उपकरण के जरिए बात करें या मोबाइल हाथ में रख कर या फिर कान में ब्लूटुथ डिवाइस लगा कर, गाड़ी चलाते समय फोन पर बात करने से ध्यान तो बंटेगा ही और ऐसा करना हादसे को निमंत्रण देना है। लेकिन अब जितने भी नए वाहन आ रहे हैं उनमें बिना फोन हाथ में लिए बात करने की सुविधा है। एसे में सवाल है कि गाड़ी चलाते वक्त अगर कोई फोन पर बात करता है तो उसे यातायात पुलिस कर्मी कैसे रोक पाएगा। जबकि हकीकत यह है सड़क हादसों में ज्यादातर हादसे गाड़ी चलाने के दौरान मोबाइल के इस्तेमाल से हो रहे हैं। क्या इस समस्या का उपाय नहीं खोजा जाना चाहिए। इससे भी बड़ा सवाल है खोजेगा कौन? कार बनाने वाली कंपनियां या सरकार यातायात पुलिस का सिपाही?

भारी जुर्माने का विरोध इसे बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए जाने और कुछ अधिकारियों व चालान काटने वालों की मनमानी के कारण भी है। भारी जुर्माने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि लोग-बाग कम पैसे ले-देकर समझौता कर लेते हैं, जबकि जुर्माना कम हो तो इसकी गुंजाइश कम रहती है। कम पैसे लेकर छोड़ने के मामले भी अलग तरह की समस्या खड़ी करते हैं। इससे चालान करने वालों का विरोध होता है, मनमानी होती है और उसमें पुलिसिया पिटाई जैसी नौबत तक आ जाती है। उदाहरण के लिए, पटना में यातायात पुलिस वालों ने एक छात्र की पिटाई कर दी। वह खाना खाने निकला था कि पुलिस ने उसे चालान न देने के ‘जुर्म’ में न केवल पकड़ लिया, बल्कि खूब पीटा भी, जबकि उसके पास कोई गाड़ी नहीं थी। वह पैदल सड़क पर आॅफिस से खाना खाने निकला ही था। निश्चित रूप से यह नियम लागू करने वालों की गुंडागर्दी है और पहले से है।

नए मोटर वाहन कानून का विरोध भले ही भारी जुर्माने के कारण किया जा रहा है, लेकिन सच यही है कि रोका उन्हें ही जाता है जो बिना हेलमेट या सीट बेल्ट के हों, लाल बत्ती पार करें, नंबर प्लेट सही न हो या ऐसी ही कोई खामी हो जो स्पष्ट दिखाई दे जाए। कायदे से इसमें उस एक अपराध का ही चालान होगा। लेकिन अगर ड्राइविंग लाइसेंस न हो, प्रदूषण प्रमाणपत्र न हो तो सबके चालान कटेंगे ही और निश्चित रूप से यह ज्यादा होगा। बिना हेलमेट या बिना सीट बेल्ट चलने का जुर्माना ज्यादा नहीं है, पर कोई कागज ही न हो तो जाहिर है जुर्माना ज्यादा होगा। किसी एक कानून का उल्लंघन और कानून की परवाह ही न होना, दो अलग-अलग चीजें हैं और दोनों में जुर्माना एक नहीं हो सकता है।

उदाहरण के लिए, नगालैंड के एक ट्रक पर ओड़िशा में साढ़े छह लाख रुपए से ज्यादा का जुर्माना किए जाने की खबर आई। निश्चित रूप से यह बहुत ज्यादा है पर इसमें 2014 से अब तक रोड टैक्स न चुकाने पर ही 6.40 लाख रुपए का जुर्माना लगा है। यह सही है कि नहीं, अलग मुद्दा है। अगर हो भी तो पांच साल रोड टैक्स नहीं चुकाने पर भारी जुर्माना क्यों नहीं लगना चाहिए और पांच साल का रोड टैक्स भी कम नहीं होगा। यह सही है कि नया मोटर वाहन कानून लागू होने के बाद से इसके समर्थन या विरोध में जो कुछ लिखा गया है, उसमें आंकड़ों और तथ्यों के बारे में कोई गंभीर काम नहीं है।

यह भी गौरतलब है कि यातायात के जिन नियमों का उल्लंघन नेता, वीआइपी और सेलीब्रिटी लोग ज्यादा करते हैं उसमें जुर्माना कम है। उदाहरण के लिए काला शीशा। यह अपराधियों के लिए मददगार है फिर भी जुर्माना सिर्फ पांच सौ रुपए है। आम आदमी के उल्लंघन वालों में जुर्माना ज्यादा है। नया मोटर वाहन कानून कोई खौफनाक कानून नहीं है। समस्या इस बात की है कि हमारे भीतर किसी कानून को ईमानदारी से लागू कराने की इच्छाशक्ति नहीं है। वरना कुछ राज्य जिस तरह से विरोध पर उतर आए हैं उससे तो ऐसा लग रहा है कि जैसे यह कोई दमनकारी कानून हो जिसे लागू करना जनता के हित में नहीं होगा। सरकारों को चाहिए कि वे जुर्माने को खौफ के रूप में न दिखाएं, बल्कि लोगों में इसके प्रति जागरूकता पैदा करें।

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