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संपादकीय: असफलताएं सिखाती हैं

लूना-8 की चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग होनी थी, लेकिन वह भी आसानी से उतरने के बजाय चांद की सतह पर जा टकराया था। सोवियत संघ ने पहले अंतरिक्ष यात्री यूरी गगारिन को 1961 में अंतरिक्ष में भेजा था।

Author Updated: September 21, 2019 1:31 AM
भारत ने 19 अप्रैल 1975 को अपने वैज्ञानिकों द्वारा तैयार पहले उपग्रह आर्यभट्ट को सोवियत संघ से और उसकी ही मदद से प्रक्षेपित किया था।

चंद्रयान-2 मिशन को पूरी तरह विफल कहना उचित नहीं होगा। यह अंतरिक्ष मिशन काफी हद तक कामयाब रहा है। इसलिए इस मुकाम पर जश्न मनाने का मौका नहीं मिला तो इसे लेकर निराश होने का भी कोई औचित्य नहीं है। साथ ही, वैज्ञानिकों को यह समझाने या ढाढ़स बंधाने की भी आवश्यकता नहीं है कि विफलताओं से ही सफलता का मार्ग मिलता है। वैज्ञानिक सात सितंबर को उसी वक्त से नई राह तलाशने में जुट गए थे जब विक्रम लैंडर चंद्रमा से मात्र 2.1 किलोमीटर की दूरी से बहक गया था। चांद की सतह पर तिरछे पड़े विक्रम लैंडर को खोज निकालना और उसे पुन: सक्रिय करने के निरंतर प्रयास वैज्ञानिकों के दृढ़ संकल्प के द्योतक हैं।

विज्ञान प्रयोगों के आधार पर आगे बढ़ता है। प्रयोग जब विफल होते हैं तो विफलता के कारणों का पता लगाने से ही सफलता का रास्ता बनता है और यह सिलसिला आज से नहीं, मानव विकास के इतिहास के साथ समांंतर रूप से चल रहा है। अंतरिक्ष की दौड़ में शामिल राकेटों का इतिहास भी भिन्न नहीं है। माना जाता है कि किसी निर्जीव वस्तु को आसमान में दागने का प्रयोग ईसा से चार सौ वर्ष पूर्व इटली के टारेंटम निवासी आर्चिटस ने लकड़ी के कबूतर को उड़ा कर किया था। फिर चीन में खोखले बांस से बनाए डंडे में बारूद भर कर उसे दुश्मन पर दागने और मंगोलों द्वारा उसे अपने शस्त्रागार का अंग बनाने के भी संदर्भ मिलते हैं। बहुत दूर के इतिहास में जाने की जरूरत नहीं है।

भारत ने 19 अप्रैल 1975 को अपने वैज्ञानिकों द्वारा तैयार पहले उपग्रह आर्यभट्ट को सोवियत संघ से और उसकी ही मदद से प्रक्षेपित किया था। इसके बाद ही भारत के राजनीतिक नेतृत्व और वैज्ञानिकों ने अपने बलबूते अपने ही प्रक्षेपण स्थल से उपग्रह प्रक्षेपित करने का संकल्प लिया था। लेकिन 10 अगस्त 1979 को जब इस संकल्प को पूरा करने की बारी आई तो उपग्रह आसमान में जाने के बजाय बंगाल की खाड़ी में जा गिरा था। इसे पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया जाना था, लेकिन र्इंधन रिसाव के कारण मिशन विफल हो गया था। तब इस मिशन के निदेशक डा. एपीजे अब्दुल कलाम थे और इसरो अध्यक्ष प्रोफेसर सतीश धवन थे। बताते हैं तब प्रो. सतीश धवन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला कर कहा था कि इस मिशन में हम विफल हो गए हैं, लेकिन मुझे अपनी टीम पर पूरा भरोसा है और अगली बार हम निश्चित रूप से कामयाब होंगे।

इस विफलता के बावजूद डा. कलाम के नेतृत्व में ही मिशन जारी रहा और अंतत: 18 जुलाई 1980 को भारत का पहला उपग्रह ‘रोहिणी’ भारत में निर्मित उपग्रह प्रक्षेपण यान (एसएलवी-3) से प्रक्षेपित कर पृथ्वी की कक्षा में सफलता पूर्वक स्थापित कर दिया गया था। तब इस ऐतिहासिक सफलता के मौके पर प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए सतीश धवन ने स्वयं आगे आने के बजाय डा. कलाम को आगे रखा था। मतलब यह कि विफलता का अपयश लेने वाले इसरो अध्यक्ष ने सफलता का श्रेय भी लेने के बजाय वह स्वर्णिम अवसर डा. कलाम को देकर एक आदर्श नेतृत्व का उदाहरण वैज्ञानिक बिरादरी के समक्ष पेश कर भविष्य के लिए एक मिसाल कायम कर दी थी।

रोहिणी उपग्रह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा शुरू की गई उपग्रहों की एक शृंखला थी जिसकी सफलता की शुरुआत रोहिणी प्रौद्योगिकी पेलोड (आरटीपी) की विफलता की बुनियाद पर हुई थी। इसके बाद भारत को अंतरिक्ष में छलांग लगाने के लिए रास्ता मिल गया था। इसरो द्वारा विकसित किए गए पांच प्रक्षेपण यान एसएलवी-3, एएसएलवी, पीएसएलवी, जीएसएलवी, एसएलवी मार्क-3, जिसका दूसरा नाम एएलवीएम-3 है, अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक अपने मिशन पूरे कर चुके हैं। इसरो के अधिकांश उपग्रह स्वदेशी पीएसएलवी और जीएसएलवी राकेटों से ही प्रक्षेपित किए गए। इनमें चंद्रयान प्रथम और मंगल यान भी शामिल हैं।

अक्तूबर 1994 से लेकर 2015 तक पीएसएलवी (धु्रवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान) ने एक के बाद एक अट्ठाईस सफलताएं हासिल कीं। इसरो ने चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम के अंतर्गत 22 अक्तूबर, 2008 को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से पीएसएलवी से ही चंद्रयान-1 प्रक्षेपित किया था जो 30 अगस्त, 2009 तक सक्रिय रहा। यह चंद्रमा की तरफ कूच करने वाला भारत का पहला अंतरिक्ष यान था। चंद्रयान ऑर्बिटर का मून इंपैक्ट प्रोब (एमआइपी) 14 नवंबर 2008 को चंद्रमा की सतह पर उतरा था जिससे भारत चंद्रमा पर अपना झंडा गाढ़ने वाला चौथा देश बना।

यही नहीं, पीएसएलवी ने अनेक विदेशी उपग्रहों को भी प्रक्षेपित किया। इसरो ने पांच जनवरी, 2014 को जीएसएलवी के जरिए श्री हरिकोटा से जीसैट-14 उपग्रह को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया था। उसी साल 18 दिसंबर को यहां एलवीएम-3 एक्स के द्वारा दो बड़े ठोस राकेट बूस्टर और राकेट द्रव्य का परीक्षण किया गया। इसके बाद 15 जनवरी 2017 को इसरो ने पीएसएलवी-सी 37 के द्वारा एक साथ 104 उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर अंतरिक्ष में भारत की सफलताओं का नया इतिहास रचा था। जून 2016 में इसरो ने एक ही राकेट पीएसएलवी द्वारा बीस उपग्रह प्रक्षेपित किए थे।

चार जुलाई 1957 को दुनिया का पहला अंतरिक्ष यान प्रक्षेपित करने वाले सोवियत संघ और फिर 21 जुलाई 1969 को चांद पर अपोलो-11 के कमांडर नील आर्मस्ट्रांग को उतारने वाले अमेरिका को भी अंतरिक्ष में सफलताओं के झंडे गाढ़ने से पहले कई बार विफलताओं का सामना करना पड़ा था। सन 1963 में चार जनवरी को स्पुतनिक-25 का सफल प्रक्षेपण तो हुआ था, मगर उसके बाद खराबी के चलते उसका राकेट पृथ्वी की कक्षा से बाहर नहीं निकल पाया था। इसके बाद सोवियत संघ के लूना ई-6 (3 जनवरी 1963 को प्रक्षेपित), लूना-4 (2 अप्रैल 1963 को प्रक्षेपित), लूना-ई-6 (21 मार्च 1964 को प्रक्षेपित), कास्मोस-60 (12 मार्च 1965 को प्रक्षेपित), लूना ई-60 (10 अप्रैल 1965 को प्रक्षेपित), लून-5 ( 9 मई 1965 को प्रक्षेपित), लूना-6 (8 जून 1965 को प्रक्षेपित), लूना-7 ( 4 अक्टूबर 1965 को प्रक्षेपित), लूना-8 (3 दिसंबर 1965 को प्रक्षेपित), और लूना -18 ( 2 दिसंबर 1971 को प्रक्षेपित) मिशन विफल रहे थे।

लूना-8 की चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग होनी थी, लेकिन वह भी आसानी से उतरने के बजाय चांद की सतह पर जा टकराया था। सोवियत संघ ने पहले अंतरिक्ष यात्री यूरी गगारिन को 1961 में अंतरिक्ष में भेजा था। भारत का चंद्रयान-2 मिशन में भी ‘विक्रम’ की चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग होनी थी, जो हो नहीं पाई।

इसी तरह अमेरिका ने 20 सितंबर 1966 को सर्वेयर-2 प्रक्षेपित किया था जो चांद की सतह से एक सौ तीस किलोमीटर दूरी पर ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। 14 जुलाई 1967 को प्रक्षेपित सर्वेयर-4 भी चांद पर लैंडिंग से ढाई मिनट पहले रेस्ट्रोराकेट में विस्फोट से उसका भी संपर्क धरती के नियंत्रण कक्ष से टूट गया। इस साल (22 फरवरी 2019) चंद्रमा पर उतरने का इजराइल का बेरेशीट मिशन भी विफल रहा।

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम नया नहीं है और हमारी सफलताएं और विफलताएं भी कार्यक्रम के साथ आगे बढ़ती रहती हैं। विज्ञान न केवल आसमान में नई संभावनाएं तलाशने के साथ ही अंतरिक्ष की अबूझ पहेलियों को बूझने का प्रयास कर रहा है, बल्कि अंतरिक्ष और विज्ञान की खोजों माध्यम से धरती पर मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए अनवरत प्रयास हो रहे हैं। इस महान बिरादरी के महान कार्यों का श्रेय छीन कर अपने सिर पर सजाने की प्रवृत्ति को भी प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। देश में वैज्ञानिक शोधों को बढ़ावा देने के लिए वैज्ञानिक समुदाय को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं मुहैया कराने की जरूरत कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।

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