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संपादकीय: संवेदनहीनता की हद

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 (ए) के तहत भी यह कहा गया है कि हर जीवित प्राणी के प्रति सहानुभूति रखना भारत के सभी नागरिकों का मूल कर्तव्य है।

Author Published on: October 19, 2019 1:48 AM
हमारे समाज में सभी जीवों के प्रति संवेदनशील होने की सीख दी जाती रही है। (सांकेतिक तस्वीर)

मध्यप्रदेश में ग्वालियर जिले के समूदन गांव में आवारा घूम रही आठ गायों सहित सत्रह गोवंश की मौत जिस तरह हुई, हो सकता है उसे कुछ पशुओं की मौत मान कर लोग बाकी का काम बिना किसी परेशानी के करने लगें। लेकिन इंसानी समाज अपने विकास के साथ आज जिस मुकाम तक पहुंच सका है, वहां यह उम्मीद होगी कि लोगों के भीतर किसी भी जीव के प्रति संवेदना के तत्त्व जिंदा रहें। सवाल है कि जो पशु न केवल आम जीवन, बल्कि उपयोगिता के लिहाज से भी मानव समाज के साथी रहे हैं, लोग उनकी देखरेख के लिए तन-मन-धन से समर्पित रहे हैं, आज उनके आवारा घूमने की नौबत कैसे आ गई है!

गौरतलब है कि ये पशु आमतौर पर निजी स्वामित्व से लेकर गोशालाओं के संरक्षण में पलते रहे हैं और उनकी देखभाल का एक समूचा सामाजिक तंत्र बना रहा है। लेकिन समूदन गांव के आसपास ये पशु आवारा घूम रहे थे और कुछ लोगों ने स्थानीय सरकारी स्कूल के एक कमरे में उन्हें ठूंस कर बंद कर दिया। उस कमरे में वे पशु पिछले सात दिन से बिना चारा-पानी के बंद थे और आखिर उनमें से सत्रह की जान चली गई।

इस मामले में पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है और अब दोषियों की खोज की जाएगी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जहां गाय एक राजनीतिक मुद्दे के रूप में बेहद संवेदनशील पशु के तौर पर देखी जाने लगी है, वहीं इतनी सारी गायें बिना किसी संरक्षण के आवारा घूमने की हालत में हैं और कुछ लोगों की ऐसी क्रूरता की शिकार बन रही हैं। हाल में ऐसी खबरें जरूर आई हैं कि आवारा पशुओं की वजह से कई इलाकों में खेतों में लगी फसलों को काफी नुकसान पहुंच रहा है। गाय या बैल जैसे पशु अब तक सामाजिक जिम्मेदारी रहे हैं, उनके पालन-पोषण से लेकर अंतिम समय तक के लिए एक समूचा चक्र बना हुआ है और पशुपालन के काम में लगे लोग अपने पालतू पशुओं को लेकर कई बार बेहद भावुक भी रहे हैं। लेकिन आज यह देखना विचित्र है कि कुछ लोग पशुओं के खिलाफ इस हद तक बेरहम हो जा रहे हैं।

हमारे समाज में सभी जीवों के प्रति संवेदनशील होने की सीख दी जाती रही है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 (ए) के तहत भी यह कहा गया है कि हर जीवित प्राणी के प्रति सहानुभूति रखना भारत के सभी नागरिकों का मूल कर्तव्य है। पशुओं के प्रति क्रूरता के खिलाफ कई कानून भी मौजूद हैं। लेकिन इन पहलुओं की अनदेखी करके आज पशुओं के प्रति ऐसे बर्ताव करते हुए लोग नहीं हिचक रहे हैं। अक्सर सड़कों पर गुजर रहे वाहनों में गाय-भैंस या दूसरे पशुओं को बेहद तकलीफदेह हालात में ले जाते देखा जा सकता है।

कई बार आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या की शिकायतों के बाद संबंधित प्रशासनिक महकमे के लोग जिस तरह उन्हें वाहनों में भर कर ले जाते हैं, वह मनुष्य की संवेदना पर एक सवालिया निशान की तरह होता है। जबकि पशुओं को असुविधा में रख कर, दर्द पहुंचा कर या परेशान करते हुए किसी भी गाड़ी में एक से दूसरी जगह ले जाना दंडनीय अपराध भी है। सभ्य समाजों का हिस्सा होने के नाते मनुष्य से इस तरह की संवेदनहीनता की अपेक्षा कतई नहीं होती है। इंसान और पशु की जगह अलग-अलग हो सकती है। लेकिन इंसान से यह उम्मीद जरूर होगी कि कम से कम वह अपनी इंसानियत ही बचा ले!

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