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संपादकीय: अभिव्यक्ति पर अंकुश

मीडिया में व्यंग्य और कार्टून की विधा को किसी मुद्दे के चित्रण का हल्का-फुल्का जरिया माना जाता है और राजनीतिक तबकों के बीच आमतौर पर इसे लेकर कोई नकारात्मक रुख नहीं रहा है।

Author Published on: May 23, 2019 1:41 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

राजनीतिक दलों और उनसे जुड़े प्रतिष्ठित लोगों की गतिविधियों और उनके बयानों आदि को संदर्भ बना कर समाचार माध्यमों में खबरों से लेकर व्यंग्य और कार्टून प्रकाशित होते रहे हैं। ज्यादातर राजनीतिकों ने मीडिया में इस तरह की प्रस्तुतियों को लेकर कोई खास आपत्ति जाहिर नहीं की है। बल्कि आमतौर पर इसे सकारात्मक आलोचना या एक भिन्न स्वर के रूप में देखा गया है। लेकिन कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने राजनीतिकों को कार्टून या व्यंग्य का विषय बनाने के मसले पर जिस तरह कानून के जरिए मीडिया को नियंत्रित करने का विचार जाहिर किया है, वह देश की लोकतांत्रिक परंपरा के अनुकूल नहीं है। मीडिया में कार्टूनों या व्यंग्य के जरिए नेताओं को निशाना बनाने पर नाराजगी जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया हमारे नाम का गलत प्रयोग कर किसकी मदद करने की कोशिश कर रहा है; क्या आपको लगता है कि हम कार्टून का कोई चरित्र लगते हैं और आपको किसने यह अधिकार दे दिया कि सभी चीजों को मजाकिया तौर पर दिखाइए!’ यह विचित्र है कि मीडिया में व्यंग्य या कार्टून के सहारे किसी स्थिति पर टिप्पणी उन्हें इस कदर आहत कर गई कि रिपोर्टिंग में ‘गैरजिम्मेदारी’ की दलील देकर उस पर कानून के जरिए नियंत्रण की धमकी दे दी।

हो सकता है कि कोई कार्टून किसी के व्यक्तित्व का ऐसा चित्रण करता है, जिससे आम लोगों के बीच उस व्यक्ति की छवि पर नकारात्मक असर पड़ता है। कई बार ऐसे कार्टून बनाने वालों की मंशा पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। लेकिन ऐसे कार्टूनों को किसी की अभिव्यक्ति मान कर क्या उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती? क्या इसे किसी के राय जाहिर करने के तौर पर नहीं स्वीकार किया जा सकता है? अगर किसी कार्टून से ऐसा लगता है कि उसमें व्यक्ति की खिल्ली उड़ाई गई है और उसका कोई आधार नहीं है, तो इसे आम लोगों के विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वे उसे किस रूप में देखें और समझें। कोई व्यंग्य या कार्टून गलत मंशा से प्रस्तुत किया गया है तो निश्चित रूप से लोग उसे आखिरकार खारिज देंगे। लेकिन कार्टून बनाने वालों के खिलाफ आक्रामक रवैया अख्तियार करना एक तरह से अभिव्यक्ति को बाधित करना है।

मीडिया में व्यंग्य और कार्टून की विधा को किसी मुद्दे के चित्रण का हल्का-फुल्का जरिया माना जाता है और राजनीतिक तबकों के बीच आमतौर पर इसे लेकर कोई नकारात्मक रुख नहीं रहा है। बल्कि एक परंपरा रही है कि काफी ऊंचे कद के नेता भी अपने लिए आलोचनात्मक स्वर के साथ बनाए गए कार्टूनों को सहज भाव से लेते रहे हैं। अभिव्यक्ति की इस तरह की स्वतंत्रता निश्चित रूप से एक लोकतांत्रिक समाज की जड़ों को मजबूत करती है। पर पिछले कुछ समय से राजनीतिक हलकों में नेताओं के बीच सहिष्णुता में तेजी से कमी देखी गई है। कुछ नेताओं को केंद्र में रख कर अगर किसी कार्टूनिस्ट ने कोई व्यंग्यात्मक रेखाचित्र बनाया तो उसमें मौजूद आलोचनात्मक स्वर को एक भिन्न विचार के रूप में स्वीकार करने के बजाय उस पर सख्त रुख अख्तियार किया गया। कहीं किसी कार्टूनिस्ट को कानूनी कार्रवाई के दायरे में फंसना पड़ा तो कहीं प्रत्यक्ष जोखिम से गुजरना पड़ा। यह सब मौजूदा कानूनी व्यवस्था के तहत चलता रहा। लेकिन अगर इस मसले पर अलग से विधिवत कानून बना कर अभिव्यक्ति को सीमित किया जाता है, तो इसमें कोई शक नहीं कि इससे लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होंगी।

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