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संपादकीय: महंगा परिचालन

यों रेलवे कई स्टेशनों के रखरखाव की जिम्मेदारी निजी हाथों को सौंप रहा है।

Author Published on: December 4, 2019 2:17 AM
रेलवे की कमाई का सबसे बड़ा स्रोत माल ढुलाई है।

अर्थव्यवस्था की सुस्ती को लेकर अभी बहसें चल ही रही हैं कि रेलवे की हालत ठीक न होने के आंकड़े ने सरकार के लिए नई चिंता पैदा कर दी है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी ने रिपोर्ट दी है कि 2018-19 के दौरान रेलवे की कमाई और परिचालन खर्च में बहुत कम अंतर था। उसे सौ रुपए कमाने के लिए अट्ठानबे रुपए चौवालीस पैसे खर्च करने पड़े। यह पिछले दस सालों में सबसे अधिक परिचालन खर्च है।

यह तब है, जब रेलवे ने पिछले सालों में यात्री और माल भाड़े में बढ़ोतरी की है। इस दौरान कई नई गाड़ियां भी चली हैं। यात्रियों की संख्या बढ़ी है। फिर भी उसकी कमाई और परिचालन खर्च में बहुत कम का अंतर रह गया है, तो यह निस्संदेह चिंता का विषय है। जिस वर्ष का रेलवे के परिचालन पर खर्च का लेखाजोखा पेश किया गया है, उस वर्ष उसने अपनी कुछ ग्राहक कंपनियों से अग्रिम शुल्क ले रखा था, वरना उसके लिए अपना खर्च संभालना मुश्किल होता। इसलिए सीएजी ने सुझाव दिया है कि रेलवे को अपनी आंतरिक आय बढ़ाने के उपायों पर ध्यान देना चाहिए, ताकि सकल बजटीय प्रावधान पर निर्भर न रहना पड़े।

रेलवे की कमाई का सबसे बड़ा स्रोत माल ढुलाई है। उसके बाद यात्री भाड़ा और फिर कुछ आमदनी रेलवे स्टेशनों पर व्यावसायिक गतिविधियों के लिए दी गई जगहों के किराए से हो जाती है। पिछले कई सालों से रेलवे को विश्वस्तरीय सुविधाओं से लैस करने का दम भरा जा रहा है। इसमें रेलवे स्टेशनों की मरम्मत, गाड़ियों की रफ्तार बढ़ाने और उनमें सुरक्षा और यात्री सुविधाएं बेहतर बनाने का संकल्प दोहराया जाता रहा है। ऐसे में जाहिर है कि परिचालन खर्च बढ़ने से रेलवे के लिए इन पक्षों पर आगे कदम बढ़ाने के लिए काफी सोचना पड़ेगा।

पहले ही नई पटरियां बिछाने, पुराने पुलों की जगह नए पुल बनाने, रेल लाइनों के विद्युतीकरण, गाड़ियों में टक्कररोधी उपकरण लगाने आदि जैसी रेलवे की अनेक परियोजनाएं लंबे समय से लटकी पड़ी हैं। कमाई न हो पाने से नई परियोजनाएं शुरू करना तो दूर, रुकी हुई परियोजनाओं को गति दे पाना ही कठिन होगा।

रेलवे की कमाई घटने की कुछ वजहें समझी जा सकती हैं। इसका सीधा संबंध अर्थव्यवस्था की सुस्ती से है। छिपी बात नहीं है कि औद्योगिक क्षेत्र का उत्पादन काफी घटा है। वाहन और कपड़ा उद्योग जैसे कई क्षेत्रों पर आर्थिक मंदी की बहुत बुरी मार पड़ी है। स्वाभाविक ही इससे रेलवे की माल ढुलाई पर असर पड़ा है, जो कि उसकी कमाई का बड़ा जरिया है। यानी जब तक औद्योगिक क्षेत्र में तेजी नहीं आती, रेल के पहियों में भी सुस्ती बनी रहेगी।

जाहिर है, इस सुस्ती से पार पाने के लिए रेलवे को कुछ कठोर कदम उठाने होंगे। उनमें से पहला कदम यही हो सकता है कि वह अपने भाड़े और किराए में बढ़ोतरी करे। मगर इसका सीधा असर मुसाफिरों पर पड़ेगा। लोग पहले ही महंगाई से परेशान हैं, रेल भाड़े में बढ़ोतरी उन पर अतिरिक्त बोझ साबित होगी।

यों रेलवे कई स्टेशनों के रखरखाव की जिम्मेदारी निजी हाथों को सौंप रहा है। उससे उसका खर्च कुछ कम हो सकता है। मगर मुसाफिरों की जेब पर उसका भार पड़ने से इनकार नहीं किया जा सकता। रेलवे सार्वजनिक परिवहन का बड़ा तंत्र है, अगर उसकी स्थिति सुधारने का प्रयास जल्दी नहीं किया गया, तो यह सरकार की बड़ी विफलता साबित होगी।

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