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संपादकीय: खर्चीला संचार

वोडाफोन, एअरटेल, जियो और आइडिया ने अलग-अलग बयान जारी कर अपने बढ़े हुए शुल्कों की जानकारी दी।

Author Published on: December 3, 2019 2:14 AM
पिछले करीब चार सालों में यह पहली बढ़ोतरी है।

संचार कंपनियां जिस तरह कुछ समय से अपने घाटे का ब्योरा दे रही थीं, उसी से जाहिर हो गया था कि मोबाइल फोन सेवाओं के शुल्क बढ़ सकते हैं। आखिरकार सभी बड़े नेटवर्क वाली कंपनियों ने अपने शुल्क में चालीस से पचास फीसद तक बढ़ोतरी की घोषणा कर दी। वोडाफोन, एअरटेल, जियो और आइडिया ने अलग-अलग बयान जारी कर अपने बढ़े हुए शुल्कों की जानकारी दी। पिछले करीब चार सालों में यह पहली बढ़ोतरी है। अब उपभोक्ताओं को न सिर्फ मुफ्त बातचीत के लिए मिलने वाले असीमित समय और प्रतिदिन मिलने वाले इंटरनेट डाटा का लाभ मिलना कम हो जाएगा, बल्कि उन्हें नियमित शुल्क भी बढ़ी दर पर चुकाना पड़ेगा।

यानी अब तक जो लोग सौ रुपए खर्च किया करते थे, उन्हें नई शुल्क दर के अनुसार करीब डेढ़ सौ रुपए खर्च करने पड़ेंगे। इस पर स्वाभाविक ही कुछ लोगों को हैरानी हो रही है कि ये कंपनियां जब पिछले चार सालों से मुफ्त या सस्ती सेवाएं उपलब्ध करा रही थीं, तो अचानक ऐसा क्या हुआ कि वे घाटा उठाने लगीं और उन्हें शुल्क की दरें बढ़ानी पड़ीं! हैरानी इस पर भी स्वाभाविक है कि मोबाइल कंपनियों की इस घोषणा पर दूरसंचार नियामक अधिकरण यानी ट्राई ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

दूरसंचार के क्षेत्र में निजी कंपनियों को इसलिए कारोबार का मौका दिया गया था कि इससे संचार के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और इसके फलस्वरूप संचार शुल्क घटेगा। इसके सकारात्मक नतीजे भी आए। संचार सेवाओं के शुल्क काफी कम हो गए। मोबाइल सेवाओं की पहुंच सामान्य आयवर्ग तक भी संभव हो सकी। स्मार्टफोनों का चलन बढ़ा और इंटरनेट सेवाओं का तेजी से विस्तार हुआ। सेवा क्षेत्र में जितनी तेजी से दूरसंचार का विस्तार हुआ, उतना किसी अन्य क्षेत्र में नहीं हुआ। इसी दौर में जियो ने असीमित मुफ्त बातचीत और इंटरनेट सेवाएं देने की लंबे समय तक योजनाएं चलार्इं। उसका नतीजा यह हुआ कि जिन लोगों के पास फोन सेवाएं नहीं पहुंची थीं, वे भी इसका लाभ उठाने लगे। आंकड़े बताते हैं कि संचार सेवाओं के मामले में भारत सबसे तेजी से उभरता देश हो गया। अब बहुत कम परिवार ऐसे हैं, जिनके पास मोबाइल सेवाओं की पहुंच नहीं है। यानी उपभोक्ताओं की संख्या निरंतर बढ़ी है। फिर दूरसंचार कंपनियों को घाटा कैसे उठाना पड़ रहा था!

इसकी कुछ वजहें समझी जा सकती हैं। एक तो यह कि निजी दूरसंचार कंपनियों ने प्रतिस्पर्धा के चलते बहुत तेजी से अपनी सेवाओं के विस्तार पर जोर दिया। उसमें सस्ती दर पर अधिक सेवाएं उपलब्ध कराने की योजनाएं भी चलार्इं। इस तरह उनका खर्च बढ़ता रहा और कमाई अपेक्षित रूप से कम हुई। फिर बाजार में मंदी, महंगाई बढ़ने और लोगों की कमाई घटने की वजह से बहुत सारे लोगों ने अपने खर्चों पर अंकुश लगाना शुरू कर दिया। इसका असर दूरसंचार कंपनियों के कारोबार पर भी स्वाभाविक रूप से पड़ा। महंगाई बढ़ती है तो सेवाएं भी महंगी होती हैं। पर जिस क्षेत्र में उपभोक्ता निरंतर बढ़ रहे हैं, जिस पर तमाम कारोबारी और सामाजिक गतिविधियों की निर्भरता बढ़ती जा रही है, उसमें लाभ कम रहने का तर्क खटकता ही है। सरकारी संचार सेवाओं की हालत बहुत खराब है, जिसकी वजह से अधिसंख्य लोग निजी संचार सेवाओं की तरफ मुड़ चुके हैं। ऐसे में कमजोर आर्थिक स्थिति वाले, जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल सेवाओं का लाभ लेने वाले, तेजी से घटेंगे। तब इन कंपनियों के लिए अपना घाटा पाटना और मुश्किल हो सकता है।

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