ताज़ा खबर
 

आरक्षण का आधार

आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को शिक्षा और नौकरियों में दस फीसद आरक्षण संबंधी संविधान संशोधन विधेयक सरकार का एक साहसिक कदम है। इसकी मांग लंबे समय से जब-तब उठती रही है। लगभग सभी राजनीतिक दल इसके पक्ष में रहे हैं। कई राज्य सरकारें भी आर्थिक रूप से पिछड़ी सामान्य वर्ग की कुछ जातियों के लिए आरक्षण के वादे करती रही हैं मगर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय सीमा के चलते उन्हें इस दिशा में कामयाबी नहीं मिल सकी।

Author January 10, 2019 2:24 AM
पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह 8 जनवरी 2019 को लोकसभा में बहस के दौरान (Source: LSTV screenshot)

आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को शिक्षा और नौकरियों में दस फीसद आरक्षण संबंधी संविधान संशोधन विधेयक सरकार का एक साहसिक कदम है। इसकी मांग लंबे समय से जब-तब उठती रही है। लगभग सभी राजनीतिक दल इसके पक्ष में रहे हैं। कई राज्य सरकारें भी आर्थिक रूप से पिछड़ी सामान्य वर्ग की कुछ जातियों के लिए आरक्षण के वादे करती रही हैं मगर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय सीमा के चलते उन्हें इस दिशा में कामयाबी नहीं मिल सकी। इसलिए पिछले अनुभवों को देखते हुए आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण के ताजा मसौदे की कामयाबी पर भी संदेह जताया जा रहा है। कुछ लोग इस विधेयक का यह कहते हुए विरोध कर रहे हैं कि इससे आरक्षण प्राप्त जातियों के अधिकारों का हनन होगा। विपक्षी कांग्रेस इसे चुनावी जुमला बता रही है। मगर यह नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस खुद केंद्र और कुछ राज्यों में चुनावी फायदा उठाने के मकसद से आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने का प्रयास कर चुकी है।

आरक्षण का मसला निस्संदेह जटिल है। अनुसूचित जाति-जनजाति और सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों को पचास प्रतिशत आरक्षण मिला हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि आरक्षण की सीमा इससे आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। इसलिए राजग सरकार ने बहुत सूझ-बूझ से आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण का मसौदा तैयार किया है। इससे संवैधानिक प्रावधान में कोई तोड़-फोड़ नहीं होगी, क्योंकि अब तक जो आरक्षण हैं वे सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों पर लागू हैं। ताजा आरक्षण किसी जाति या धर्म विशेष के लिए नहीं है। इसके दायरे में सभी धर्मों और जातियों के आर्थिक रूप से पिछड़े लोग आएंगे। इस तरह इस पर पचास प्रतिशत की सीमा लागू नहीं होगी। फिर चूंकि यह आरक्षण संविधान संशोधन के जरिए लागू होगा, इसलिए इस पर किसी न्यायिक विवाद की भी गुंजाइश नहीं बचेगी। अगर इसे मौलिक अधिकारों से जोड़ दिया जाता है- जैसा कि कुछ दल सुझाव दे रहे हैं- तो इसकी न्यायिक समीक्षा की भी जरूरत नहीं होगी। इस तरह सरकार के इस कदम के सैद्धांतिक विरोध की गुंजाइश न के बराबर है। यही वजह है कि विरोधी दलों ने सरकार पर तंज तो जरूर कसा, पर किसी ने तार्किक ढंग से इसका विरोध नहीं किया।

संविधान की मूल भावना गरीबों को मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने की है। इसलिए कोई भी राजनीतिक दल नहीं चाहता कि गरीबों के उत्थान के लिए उठाए गए किसी कदम का विरोध हो। यही वजह है कि आरक्षण संबंधी प्रावधान की समीक्षा की बात भी उठती रही है। एक तर्क यह भीरहा है कि आरक्षण प्राप्त जातियों के संपन्न लोगों को आरक्षण के लाभ से दूर रखा जाए। संविधान में जब सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था, तो मंशा यही थी कि कुछ समय बाद जब ये जातियां सक्षम होकर समाज की मुख्यधारा में शामिल हो जाएंगी, तब यह प्रावधान समाप्त हो जाएगा। मगर वह मकसद अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। इसीलिए आर्थिक रूप से पिछड़े दूसरे वर्ग भी अपने आरक्षण की मांग लेकर आंदोलन करते रहते हैं। इसके चलते कई मौकों पर जान-माल का भारी नुकसान भी हुआ है। कुछ राजनीतिक दल इसे अपनी राजनीति का आधार बनाते रहते हैं। ऐसे में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों का आरक्षण लागू होने से ऐसे झगड़े कम होंगे। हां, सरकार को इसमें आय संबंधी सीमारेखा पर पुनर्विचार करना चाहिए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App