ताज़ा खबर
 

संपादकीय: ऊर्जा की कूटनीति

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के चीन प्रेम के कारण भारत और नेपाल के बीच संबंधों में तनाव बढ़ा है। ओली चीन के करीबी हैं। वे लगातार यह जताने की कोशिश करते रहे कि भारत नेपाल को अपना उपनिवेश समझता है, अब नेपाल भारत से बराबरी के स्तर पर संबंधों को निर्धारित करेगा। ओली लगातार भारत को दबाव में लेने की कोशिश करते रहे। वे लगातार चीन से नजदीकियां दिखाते रहे। ओली ने चीन से पेट्रोलियम आयात की योजनाएं भी बनाईं, ताकि भारत से तेल आयात की निर्भरता से धीरे-धीरे मुक्ति पाई जा सके।

Author Published on: September 18, 2019 1:43 AM
चीन नेपाल में रेललाइन, आप्टिकल फाइबर लाइन बिछाने की योजना पर काम शुरू कर चुका है।

संजीव पांडेय
नेपाल-भारत के बीच हाल में शुरू हुई तेल पाइप लाइन दक्षिण एशिया के कई देशों के लिए सुखद संदेश है। यह पाइप लाइन दक्षिण एशिया की पहली तेल पाइप लाइन है जो दो मुल्कों को आपस में जोड़ रही है। इसका आर्थिक महत्त्व निश्चित तौर पर नेपाल के लिए है। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। भारत-नेपाल तेल पाइप लाइन के दूरगामी असर दक्षिण एशिया के कई मुल्कों पर पड़ेगा। ऊर्जा संकट से जूझ रहे दक्षिण एशिया के कई देशों को तेल और गैस की जरूरत है। भारत-नेपाल तेल पाइप लाइन का उद्घाटन उस समय हुआ है, जब भारत और नेपाल के आपसी संबंध अच्छे दौर से नहीं गुजर रहे हैं। इसलिए तेल पाइप लाइन का महत्त्व और बढ़ गया है। उम्मीद की जा रही है कि दोनों मुल्कों के बीच संबंधों में आई खटास में इस तेल पाइप लाइन से कमी आएगी। इससे दक्षिण एशिया के कई देशों को आपस में आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के लिए ऊर्जा मिलेगी। दक्षिण एशिया में ऊर्जा संकट को दूर करने के लिए कई देश तेल और गैस पाइप लाइन निर्माण की योजनाएं तो काफी पहले बना चुके हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इसमें तेजी नहीं आई। जबकि दक्षिण एशिया में ऊर्जा की समस्या दूर करने के लिए पाइप लाइनों को होना जरूरी है।

भारत और नेपाल के बीच यह तेल पाइप लाइन बिहार के मोतिहारी को नेपाल के अमलेखगंज से जोड़ती है। लगभग सड़सठ किलोमीटर लंबी इस पाइप लाइन का छत्तीस किलोमीटर का हिस्सा नेपाल में है। इस पाइप लाइन से भारत नेपाल को प्रतिवर्ष बीस लाख टन तेल भेजेगा। हालांकि भारत भी ऊर्जा को लेकर आयात पर निर्भर है। भारत भी पेट्रोलियम उत्पादों का आयात दूसरे मुल्कों से ही करता है। लेकिन तेल को लेकर नेपाल पूरी तरह से भारत पर निर्भर है, क्योंकि नेपाल के पास अपना कोई बंदरगाह तो है नहीं। नेपाल के लिए तेल आयात का एकमात्र रास्ता भारत ही है। भारत अपने तेल शोधक कारखाने से तेल नेपाल को भेजता है। नेपाल को अभी तक बिहार के बरौनी से सड़क मार्ग के जरिए ही तेल पहुंचाया जाता है। अब नेपाल को पाइप लाइन से तेल भेजा जाएगा। इससे रास्ते में तेल आपूर्ति में आने वाली कई अड़चनें भी दूर होंगी। गौरतलब है कि नेपाल में मधेसियों के आंदोलन के दौरान सड़क मार्ग से तेल आपूर्ति में खासी दिक्कतें आई थीं।

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के चीन प्रेम के कारण भारत और नेपाल के बीच संबंधों में तनाव बढ़ा है। ओली चीन के करीबी हैं। वे लगातार यह जताने की कोशिश करते रहे कि भारत नेपाल को अपना उपनिवेश समझता है, अब नेपाल भारत से बराबरी के स्तर पर संबंधों को निर्धारित करेगा। ओली लगातार भारत को दबाव में लेने की कोशिश करते रहे। वे लगातार चीन से नजदीकियां दिखाते रहे। ओली ने चीन से पेट्रोलियम आयात की योजनाएं भी बनाईं, ताकि भारत से तेल आयात की निर्भरता से धीरे-धीरे मुक्ति पाई जा सके। हालांकि ओली ने भारत-नेपाल तेल पाइप लाइन उद्घाटन के वक्त भारत-नेपाल संबंधों को और मजबूत करने पर बल दिया। लेकिन इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि नेपाल में इस समय सबसे ज्यादा चीन का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है। चीन नेपाल में ढांचागत क्षेत्र में भारी निवेश कर चुका है।

ओली चीन के कितने नजदीक जा चुके हैं, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि ओली ने ढाई अरब डालर के लागत से बनने वाली बुधी गंडकी पनबिजली योजना का जिम्मा दुबारा चीन को दे दिया। पहले भी यह परियोजना चीन को मिली थी, लेकिन बाद में चीनी कंपनी को मिले ठेके को रद्द कर दिया गया था। ओली ने सत्ता में आने के बाद फिर बुधी गंडकी पनबिजली योजना चीन के हवाले कर दिया।

चीन नेपाल में रेललाइन, आप्टिकल फाइबर लाइन बिछाने की योजना पर काम शुरू कर चुका है। चीन ने नेपाल में सड़क और हवाई अड्डे निर्माण में भी निवेश किया है। नेपाल में चीनी पर्यटकों की आवक काफी बढ़ी है, नेपाल के स्कूलों में चीनी भाषा सिखाई जा रही है। चीन और नेपाल की सेना संयुक्त सैन्य अभ्यास कर चुकी है। चीन नेपाल को हथियारों की आपूर्ति भी कर रहा है। हालांकि नेपाल में चीन का निवेश चीन की अपनी मजबूरी भी है। चीनी कंपनियों को निवेश के लिए नए इलाके की तलाश है। चीनी कंपनियों को प्राकृतिक संसाधन भी चाहिए। नेपाल में चीन का निवेश चीन की वैश्विक और एशियाई आर्थिक नीति का हिस्सा है।

रिकार्ड समय में बनाई गई भारत-नेपाल तेल पाइप लाइन अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान और पाकिस्तान के लिए अच्छा संदेश है। पिछले कई सालों से तापी (तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत) गैस पाइप लाइन परियोजना अधर में ही लटकी है। यह पाइप लाइन भारत में पंजाब के फाजिल्का शहर तक प्रस्तावित है। हालांकि इस पाइप लाइन का तुर्कमेनिस्तान की सीमा में निर्माण कार्य शुरू हो चुका है। लेकिन कई कारणों से अफगानिस्तान और पाकिस्तान में पाइप लाइन निर्माण का काम नहीं के बराबर है। हालांकि इस गैस पाइप लाइन का सबसे ज्यादा लाभ पाकिस्तान और भारत को मिलने वाला है।

दोनों मुल्कों को इस बात का इंतजार है कि कब अफगानिस्तान में शांति आए और तापी पाइप लाइन का काम तेजी से शुरू हो। लेकिन मौजूदा हालात तापी गैस लाइन के हक में नहीं हैं। आज जो हालत तापी गैस पाइप लाइन की है, वही हाल प्रस्तावित ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन की है। 1995 में इस गैस पाइप लाइन पर विचार शुरू हुआ था। 1999 में भारत भी इससे जुड़ने को तैयार हो गया।

हालांकि पाकिस्तान और ईरान के बीच गैस पाइप लाइन निर्माण पर पूर्ण सहमति 2009 में बन गई थी और ईरान-पाकिस्तान के बीच गैस पाइप लाइन निर्माण का काम शुरू भी हो गया था। लेकिन 2013 में काम रुक गया, क्योंकि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। हालांकि तब तक ईरान अपनी सीमा में गैस पाइप लाइन बिछाने का काम लगभग पूरा कर चुका था। 2013 में पाकिस्तानी सीमा में गैस पाइप लाइन का काम शुरू हुआ था इस बीच अमेरिका ने ईरान के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। इस कारण पाकिस्तान को अपने इलाके में गैस पाइप लाइन का निर्माण कार्य रोकना पड़ा।

ईरान और पश्चिमी देशों के बीच हुए परमाणु करार होने के बाद 2017 में पाकिस्तान ने एक बार फिर गैस पाइप लाइन निर्माण का काम शुरू किया। लेकिन अमेरिका ने 2018 में फिर ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी। इसके बाद फिर से पाकिस्तान ने गैस पाइप लाइन निर्माण का काम रोक दिया।

ओली इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं कि सिर्फ चीन के सहारे नेपाल नहीं चल सकता है। चीन और नेपाल का संबंध तिब्बत के रास्ते है, जहां की भौगोलिक स्थिति बहुत दुर्गम है। इसी साल जून में चीन-नेपाल रेलवे सहयोग समिति की बैठक हुई थी, जिसमें चीनी रेल विशेषज्ञों ने नेपाल के प्रतिनिधियों को स्पष्ट बताया था कि तिब्बत और नेपाल के बीच प्रस्तावित रेल लाइन के काम शुरू करने से पहले अभी और अध्ययन की जरूरत है, क्योंकि खतरनाक भूकंप क्षेत्र से प्रस्तावित रेलवे लाइन को गुजरना है।

इसलिए रेल लाइन निर्माण में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इसके बाद से ओली के सुर बदले हैं। चीन से नेपाल को सुगम आयात को लेकर भी कई चुनौतियां हैं। नेपाल-तिब्बत के सीमाई इलाके में भारी बर्फ पड़ती है। इससे साल में कुछ महीने व्यापार में भारी परेशानी आएगी। उस सूरत में पेट्रोलियम और दवाइयां जैसी जरूरी चीजों के लिए नेपाल चीन पर ज्यादा समय तक निर्भर नहीं रह सकता।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 संपादकीय: कैंसर के पांव
2 संपादकीय: घाटी में आतंकी
3 संपादकीय: खतरों से सफलता के सेनापति नरेंद्र मोदी