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संपादकीय: दागियों का दबदबा

राजनीति में शुचिता की बात करने वाले दलों को आखिर किस बात का डर है ऐसा कानून बन जाने से! अगर दागियों को राजनीति में आने से रोकना है तो इसके लिए राजनीतिक दलों को ही इच्छाशक्ति दिखानी होगी।

Author Published on: April 23, 2019 2:07 AM
2019 के आम चुनावों में 90 हजार करोड़ रुपए तक कुल खर्च का अनुमान है। (illustration by manali ghosh)

इस बार भी दागी नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकने की कवायद सिरे नहीं चढ़ पाई, नतीजतन लोकसभा चुनाव में खासी तादाद में ऐसे उम्मीदवार मैदान में हैं जो आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं तक राजनीति के इस अपराधीकरण को रोक पाने में एक तरह से बेबस साबित हुई हैं। हालांकि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को लेकर इन दोनों ही संस्थाओं ने राजनीतिक दलों को कसने की काफी कोशिशें कीं, लेकिन हमारे राजनीतिक दलों की अनदेखी से इन संस्थाओं के प्रयास विफल ही रहे हैं। इतना जरूर हुआ है कि लोग अब समझने लगे हैं कि अगर ऐसे दागी नेताओं को वोट देंगे तो आने वाले वक्त में देश की राजनीति किस दिशा में जाएगी! दागी नेताओं को लेकर सर्वोच्च अदालत ने समय-समय पर जो आदेश दिए हैं, उनसे आम जनता के बीच बड़ा संदेश तो गया है और लोग वोट डालने से पहले उम्मीदवार के बारे में विचार जरूर कर रहे हैं। लेकिन असल मुद्दा तो ऐसे दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने का है।

मतदाताओं के सामने समस्या यह होती है कि उम्मीदवार के बारे में उन्हें ज्यादा जानकारी नहीं होती। खासतौर से उसकी आपराधिक पृष्ठभूमि के बारे में। इसी का फायदा उठा कर राजनीतिक दल ऐसे उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतार देते हैं। ऐसे उम्मीदवार धन और बाहुबल की ताकत पर चुनाव लड़ते हैं और जनता के हितों, उससे जुड़े मुद्दों से उन्हें कोई सरोकार नहीं होता। इस बार भी सियासी मैदान में दागी नेताओं की फेहरिस्त लंबी है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट में बताया गया है कि पहले चरण के चुनाव में सत्रह फीसद दागी उम्मीदवार मैदान में थे, इनमें भी बारह फीसद उम्मीदवार ऐसे थे जिनके खिलाफ संगीन मामले चल रहे हैं। हैरानी की बात यह कि इनमें से बारह उम्मीदवारों ने हलफनामे में बताया कि उन पर दोष साबित हो चुके हैं। आज तीसरे चरण का मतदान है और महाराष्ट्र में चौवन ऐसे उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं जिन पर गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं।

सवाल है जब हमारे जनप्रतिनिधि हत्या, हत्या की कोशिश, अपहरण, बलात्कार जैसे संगीन अपराधों में लिप्त रहने वाले लोग होंगे तो उनसे देश किस तरह के भविष्य की उम्मीद करेगा। ऐसे दागी नेता सिर्फ जटिल और लंबी कानूनी प्रक्रिया का फायदा उठा कर ही सदनों को सुशोभित करते आए हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसे दागी नेताओं से बचा नहीं जा सकता। अगर राजनीतिक दल ठान लें तो ऐसे अपराधियों के लिए राजनीति के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो सकते हैं। पहली बात तो यह कि राजनीतिक दलों को नैतिक रूप से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले किसी उम्मीदवार को टिकट ही नहीं देना चाहिए। लेकिन चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल नैतिकता के मानदंडों को ताक पर रख देते हैं। वे इसी घातक प्रवृत्ति को अपनी कामयाबी की कुंजी मानते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल दागी नेताओं के मामले में सुनवाई के बाद यह व्यवस्था दी थी कि इस बारे में संसद को कानून बनाना चाहिए। लेकिन किसी भी दल ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की। संसद में इस मुद्दे पर सारे दल एक साथ खड़े नजर आते हैं। राजनीति में शुचिता की बात करने वाले दलों को आखिर किस बात का डर है ऐसा कानून बन जाने से! अगर दागियों को राजनीति में आने से रोकना है तो इसके लिए राजनीतिक दलों को ही इच्छाशक्ति दिखानी होगी। वरना हमारे सदन अपराधियों का अड्डा ही नजर आएंगे। ऐसे में लोकतंत्र की मूल अवधारणा को किस स्तर की चोट पहुंचेगी, यह समझना मुश्किल नहीं है।

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