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संपादकीय: संकट और उम्मीद

प्राइस वाटरहाउस कूपर्स (पीडब्लूसी) के एक वैश्विक सर्वे ने बताया है कि भारत दुनिया का चौथा ऐसा बड़ा बाजार है, जहां कंपनियां तेजी से वृद्धि कर सकती हैं।

Author नई दिल्ली | Published on: January 23, 2020 12:38 AM
सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद देश में विदेशी निवेशक आने से कतरा रहे हैं।

भारत की अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही है और इससे होने वाले संकट को भारत से लेकर विदेशी उद्योगपति तक बखूबी समझ रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद देश में विदेशी निवेशक आने से कतरा रहे हैं और घरेलू निवेशक भी घबरा कर बैठ गए हैं। ऐसे में अगर कुछ सर्वे उम्मीदों भरे नतीजे बताने लगें, तो आश्चर्य भी होता है और भविष्य के परिदृश्य को लेकर उम्मीदें भी बनती हैं। इन दिनों स्विटजरलैंड के शहर- दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक मंच (डब्लूईएफ) के सालाना सम्मेलन में ऐसी ही रिपोर्टें देखने को मिल रही हैं जो दुनिया के देशों की आर्थिकी की हकीकत को सामने रख रही हैं, तो कारोबारियों के लिए आशा की किरणें भी पैदा कर रही हैं। प्राइस वाटरहाउस कूपर्स (पीडब्लूसी) के एक वैश्विक सर्वे ने बताया है कि भारत दुनिया का चौथा ऐसा बड़ा बाजार है, जहां कंपनियां तेजी से वृद्धि कर सकती हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि चीन से लेकर अमेरिका तक के लिए भारत एक बड़ा बाजार है और भारत के साथ इन देशों का कारोबार काफी अहमियत रखता है। बल्कि सच्चाई ये है कि भले कितने विवाद हो जाएं, दोनों ही देश भारत को किसी कीमत पर इसीलिए नहीं खोना चाहते कि अगर भारत हाथ से निकल गया तो माल कहां खपाएंगे।

दुनिया के तिरासी देशों की बड़ी कंपनियों के सोलह सौ से ज्यादा मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अभी भी भारत के बाजार की ओर टकटकी लगाए हैं। इनका मानना है कि अमेरिका, चीन और जर्मनी के बाद भारत दुनिया का सबसे चौथा अच्छा बाजार है। इस सर्वे में शामिल भारत के चालीस फीसद सीईओ ये मान कर चल रहे हैं कि इस साल यानी 2020 में उनकी कंपनियों की आमद बढ़ेगी। ऐसी ही उम्मीद चीन के पैंतालीस फीसद सीईओ भी लगाए बैठे हैं। जाहिर है, भारत के बड़े बाजार से ही इनकी आमद बढ़ने का सिलसिला बनेगा और ये सपना तब साकार होगा, जब देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने लगेगी, मांग और आपूर्ति का चक्र गति पकड़ने लगेगा। अभी तो हालत यह है कि अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए सरकार के सारे कदम निरर्थक साबित हो रहे हैं और आए दिन के आंकड़े गिरावट के रुख के साथ जनता से लेकर कारोबारियों तक में निराशा ही पैदा कर रहे हैं। साफ है कि अर्थव्यवस्था के प्रबंधन को लेकर सरकार के स्तर कहीं न कहीं ऐसी नीतिगत खामियां मौजूद हैं जो उम्मीदों भरे बाजार में निराशा के माहौल को खत्म नहीं कर पा रहीं।

देश-दुनिया के ज्यादातर अर्थशास्त्री इस बात से चिंतित हैं कि सरकार ने आर्थिकी को लेकर उतनी तवज्जो नहीं दी, जितनी दी जानी चाहिए थी। तीन साल पहले सरकार के नोटबंदी जैसे कदम ने अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया। हालांकि सरकार का यह दावा रहा है कि इससे कालेधन पर काफी हद तक लगाम लगी है। इसमें कोई शक भी नहीं कि नोटबंदी जैसे कदम के बाद रीयल एस्टेट क्षेत्र में भारी गिरावट आई और इसमें होने वाले सौदों में एक सीमा तक कालेधन के चलन पर लगाम लगी भी। लेकिन नोटबंदी ने छोटे-मझोले उद्योगों से लेकर रीयल एस्टेट क्षेत्र से जुड़े प्रमुख क्षेत्रों को जो नुकसान पहुंचाया, मौजूदा मंदी की जड़ें उसी में हैं। पर अभी भी वक्त नहीं निकला है। आमद बढ़ने को लेकर जितनी उम्मीदें अभी भारत और चीन को हैं, उतनी अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी को नहीं है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि भारत में आर्थिक प्रबंधन को चुस्त-दुरुस्त और पारदर्शी बनाया जाए, ताकि निवेशकों के कदम बढ़ें और वैश्विक कारोबार में हमारी हैसियत बने।

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