ताज़ा खबर
 

संपादकीय: चिंता की दर

दूसरी तिमाही के नतीजों को देखते हुए भारतीय रिजर्व ने इस वर्ष की विकास दर पांच फीसद के आसपास रहने का अनुमान जताया।

रोजगार की कमी की वजह से उपभोग की दर भी घटी है, जिसके चलते औद्योगिक विकास दर पर प्रतिकूल असर पड़ा है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के लगातार कमजोर होते जाने को लेकर चर्चा बहुत पहले से शुरू हो गई थी, पर सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। जब चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में विकास दर घट कर साढ़े चार फीसद पर आ गई, तब सरकार के माथे पर चिंता की लकीर कुछ गाढ़ी हुई। फिर भी वित्तमंत्री ने कहा कि अर्थव्यवस्था की विकास दर कुछ सुस्त जरूर है, पर इसे मंदी कहना उचित नहीं। जल्दी ही विकास दर का रुख ऊपर की ओर मुड़ जाएगा। दूसरी तिमाही के नतीजों को देखते हुए भारतीय रिजर्व ने इस वर्ष की विकास दर पांच फीसद के आसपास रहने का अनुमान जताया। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने भी भारत की विकास दर छह फीसद के आसपास रहने का अनुमान लगाया है। अब एशियाई बैंक ने भारत में वृद्धि दर 5.1 फीसद रहने का अनुमान लगाया है। यानी भारत के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है। एशियाई विकास बैंक ने यह भी बताया है कि रोजगार सृजन की दर घटी है और फसलों के खराब होने और कर्ज की कमी के कारण खेती और ग्रामीण क्षेत्रों पर दबाव बढ़ा है। रोजगार की कमी की वजह से उपभोग की दर भी घटी है, जिसके चलते औद्योगिक विकास दर पर प्रतिकूल असर पड़ा है।

भारत की विकास दर में कमी अचानक नहीं आई है। इसकी रफ्तार पिछले चार साल से लगातार न सिर्फ सुस्त है, बल्कि इसका रुख निरंतर नीचे की तरफ बना हुआ है। पहले नोटबंदी की मार छोटे कारोबारियों पर बहुत गंभीर पड़ी थी। फिर जीएसटी लागू होने के बाद रही-सही कसर भी पूरी हो गई। इसमें करों का ढांचा तर्कसंगत न होने और नियम-कायदों की अव्यावहारिकता के कारण बहुत सारे छोटे कारोबारियों को परेशानी पैदा हुई। इसके चलते भी बहुत सारे रोजगार बंद हुए। जब छोटे कारोबार बंद होते हैं, तो रोजगार के बहुत सारे अवसर भी बंद हो जाते हैं। फिर बैंकों की बहुत बड़ी रकम बट्टे खाते में चली जाने और कर्ज वसूली न हो पाने के कारण भी न सिर्फ उनके, बल्कि दूसरे अन्य क्षेत्रों के कारोबार पर भी बुरा असर पड़ा। भवन निर्माण के क्षेत्र में कुछ तो नियमों की सख्ती की वजह से सुस्ती आई और कुछ लोगों की आय घटने या रोजगार जाते रहने से घट गई। इस तरह इस क्षेत्र में बहुत सारे लोगों के लिए रोजगार के रास्ते बंद हो गए। यों कुशल युवाओं को अपना रोजगार शुरू करने के लिए कर्ज मुहैया कराए गए, जिससे उम्मीद थी कि नए रोजगार पैदा होंगे, पर वह योजना भी कारगर साबित नहीं हुई।

इन तमाम स्थितियों के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त होती गई। अर्थव्यवस्था के खराब रहने का बड़ा असर निवेश पर पड़ता है। निवेश रुक जाता है। विदेशी कंपनियां भी खराब अर्थव्यवस्था वाले देशों में कारोबार को लेकर उत्साहित नहीं होतीं। फिर जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए विश्वबैंक आदि से जो कर्ज लिए गए होते हैं, उनके ब्याज चुकाने भारी पड़ने लगते हैं। यही वजह है कि सरकार का राजकोषीय घाटा भी बढ़ा है। ऐसे में सरकार के सामने चुनौतियां कई हैं। जब तक रोजगार नहीं बढ़ेगा, तब तक अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी और जब तक अर्थव्यवस्था कमजोर रहेगी, तब तक रोजगार के मोर्चे पर सुस्ती से पार पाना मुश्किल बना रहेगा। ऐसे में सरकार को बहुत सावधानी और संजीदगी से आर्थिक नीतियों पर विचार और फिर कोई व्यावहारिक कदम उठाने पड़ेंगे।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 संपादकीय: पर्यावरण की खातिर
2 संपादकीय: कसता शिकंजा
3 संपादकीय: विचार के बजाय
यह पढ़ा क्या?
X