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संपादकीय: चिंता की बात

आइएमएफ की चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

Author नई दिल्ली | Updated: January 22, 2020 1:07 AM
भारत के आर्थिक हालात अच्छे संकेत नहीं दे रहे हैं और विश्व बैंक, आइएमएफ जैसे वैश्विक संस्थानों की उम्मीदें भी टूट रही हैं।

भारत की आर्थिक वृद्धि दर को लेकर पिछले कुछ समय में विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, रेटिंग एजेंसियों, वैश्विक वित्तीय संस्थानों और भारतीय रिजर्व बैंक ने जो अनुमान जारी किए हैं, वे अर्थव्यवस्था की चिंताजनक तस्वीर पेश कर रहे हैं। भारत पिछले साल-डेढ़ साल से आर्थिक मंदी की मार झेल रहा है। मौजूदा वित्त वर्ष की हर तिमाही के आंकड़े गिरावट के रुख को बताते रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि आर्थिक वृद्धि में बढ़ोतरी का कोई सवाल ही नहीं उठता। हालात इतने विकट हो गए हैं कि अर्थशास्त्रियों ने साल-दो साल तक मंदी के प्रभाव से बाहर निकलने की उम्मीद छोड़ दी है। अभी तक भारत की आर्थिक वृद्धि दर पांच फीसद के आसपास रहने के अनुमान आए हैं। लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने अपना अनुमान घटाते हुए इसे 4.8 फीसद कर दिया है।

जाहिर है, भारत के आर्थिक हालात अच्छे संकेत नहीं दे रहे हैं और विश्व बैंक, आइएमएफ जैसे वैश्विक संस्थानों की उम्मीदें भी टूट रही हैं। मुद्रा कोष का मानना है कि अगर भारत ने व्यापार व्यवस्था में सुधार नहीं किए तो हालात बिगड़ते चले जाएंगे। सबसे ज्यादा चिंताजनक बात तो यह है कि भारत की खराब अर्थव्यवस्था का असर दूसरी देशों को भी प्रभावित कर सकता है, और फिर इसका प्रभाव वैश्विक आर्थिक वृद्धि पर भी बिना दिखे नहीं रहेगा।

आर्थिक वृद्धि को लेकर आइएमएफ की ये चेतावनी स्विटजरलैंड के शहर दावोस में होने जा रहे विश्व आर्थिक मंच के सालाना सम्मेलन से ठीक पहले आई है। हर साल होने वाले इस सम्मेलन में दुनिया भर के नेता और उद्योगपति हिस्सा लेते हैं। जाहिर है, ऐसे में भारत की गिरती अर्थव्यवस्था और आर्थिक नीतियों को लेकर दुनियाभर में सकारात्मक संदेश नहीं जा रहा। यही कारण है कि निवेशक भारत में आने से बिदक रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि आने वाले साल-दो साल में अर्थव्यवस्था में कोई बड़ा सुधार नहीं आने वाला।

अर्थव्यवस्था को लेकर यही खौफ भारत के भीतर भी है, मौजूदा उद्योग तक कारोबार बढ़ाने और नए कारोबार शुरू करने से हिचक रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में औद्योगिक उत्पादन में गिरावट बता रही है कि मांग नहीं होने से उद्योगों के समक्ष संकट गहराता जा रहा है। लाखों लोगों का रोजगार छिन गया है। आमद के साधन बंद हो गए हैं। युवाओं को नौकरियां नहीं मिल रहीं। इस सबका मिलाजुला असर आमद में भारी कमी के रूप में देखने को मिला है। अगर लोगों के पास पैसा नहीं होगा, तो वे खर्च क्या करेंगे? आमद-खर्च, खपत और उत्पादन में जो असंतुलन पैदा हो गया है, वह आर्थिक वृद्धि दर गिरने की मूल वजह बन गया है।

आइएमएफ की चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार लंबे समय से दावे करती रही है कि अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है और मंदी का संकट थोड़े समय का है। लेकिन मौजूदा हालात इसकी उलट तस्वीर पेश कर रहे हैं। भारत के केंद्रीय सांख्यिकीय दफ्तर के समय-समय पर जारी आंकड़े हकीकत की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त हैं। जब बाजार में मांग नहीं है, उत्पादन न्यूनतम स्तर पर जा रहा है, लोगों की आमद बढ़ नहीं रही, ग्रामीण क्षेत्र की आय में गिरावट आ रही है, महंगाई नित नए रिकार्ड बना रही है, तो आर्थिकी की बुनियाद मजबूत होने का दावा करना जनता की आंखों में धूल झोंकने से कम नहीं है। आखिर क्यों उद्योग बैंकों से कर्ज नहीं ले रहे हैं? क्यों बैंकों की उधारी दर में कमी आई है? इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है। विश्व बैंक, आइएमएफ जैसी संस्थाओं से लेकर देश-दुनिया के अर्थशास्त्री इस हकीकत को समझ रहे हैं और इसीलिए आर्थिक वृद्धि के अनुमानों में गिरावट की बात कर रहे हैं।

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