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संपादकीय: आपदाएं और बचाव की चुनौती

पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन की एक बड़ी वजह तो यह है कि विभिन्न निर्माण कार्यों, विशेषकर बांध निर्माण और खनन के लिए विस्फोटकों का अंधाधुंध उपयोग किया जाता है। इसको नियंत्रित और नियमित करना जरूरी है। वन-विनाश भी भूस्खलन की आशंका बढ़ने का एक अन्य बड़ा कारण रहा है। भूस्खलन अपने आप में बड़ी आपदा तो है ही, इससे बाढ़ भी उग्र रूप धारण कर लेती है।

Author Published on: September 14, 2019 2:01 AM
सांकेतिक तस्वीर।

भारत डोगरा

चाहे बाढ़ हो या सूखा, समुद्री तूफान हो या भूस्खलन की बढ़ती घटनाएं, गर्मी का बढ़ता प्रकोप हो या फिर वनों में लगी आग- इन सभी तरह की आपदाओं की पिछले कुछ दशकों में बिगड़ती स्थिति देखी गई है। ये आपदाएं अब भयानक रूप लेती जा रही हैं। यह स्थिति देश और दुनिया दोनों स्तरों पर नजर आ रही है। जहां कुछ आपदाओं की इस बिगड़ती स्थिति में जलवायु बदलाव की एक बड़ी भूमिका है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय कुप्रबंधन, अनुचित निर्णयों और नीतियों के कारण स्थिति और उग्र हो जाती है। केरल राज्य को लगातार दो वर्ष बाढ़ व भूस्खलन का अत्यधिक प्रकोप झेलना पड़ा है। यहां कुछ हद तक जलवायु बदलाव की भूमिका नजर आती है, तो स्थानीय कुप्रबंधन ने भी स्थिति को और बिगाड़ा है। विशेषकर अंधाधुंध निर्माण और जल-निकासी के प्राकृतिक मार्ग की अवहेलना की महंगी कीमत यहां चुकानी पड़ी है। केरल के मुख्य सचिव ने हाल ही में कहा था कि लाखों आवास खतरे की स्थिति में आ गए हैं और दस से बीस लाख लोगों का पुनर्वास करना बड़ी चुनौती है।

यही स्थिति प्राय: देश और दुनिया के अनेक ऐसे अन्य क्षेत्रों की है जिन्हें बार-बार किसी बड़ी आपदा का सामना करना पड़ा है। जलवायु संकट के दौर में ऐसे क्षेत्रों की विशेष सहायता के लिए अंतरराष्ट्रीय कोष की स्थापना की चर्चा तो बहुत होती रही है, पर इस क्षेत्र में व्यावहारिक उपलब्धि बहुत कम है। इस स्थिति में यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम आपदाओं की क्षति को न्यूनतम करने के सतत और व्यापक प्रयास करें।

कुछ क्षेत्रों, विशेषकर दक्षिण एशिया के संदर्भ में अध्ययन बताते हैं कि पिछली लगभग एक शताब्दी के दौरान भूकम्प पहले से अधिक जानलेवा बन गए हैं। सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ, जबकि इस दौरान भूकम्प से बचाव वाले भवन बनाने की तकनीक में काफी प्रगति होने के दावे किए गए। ‘साइंस’ पत्रिका में छपे एक लेख के मुताबिक वर्ष 1900 के बाद आए भूकम्पों में केवल भारत और पाकिस्तान में जितनी मौतें हुई हैं, वे इससे पहले की शताब्दियों में आए भूकम्पों के कारण हुई मौतों के मुकाबले कहीं ज्यादा हैं। भूकम्पों में हुई अधिक मौतों का कारण इस दौर में इन देशों में निर्माण के ऐसे तौर-तरीकों का उपयोग है जो कम मजबूत साबित हुए हैं। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि यहां बेहतर तकनीक उपलब्ध नहीं है। वे उपलब्ध तो हैं, पर उनका उपयोग बहुत कम है। कई ठेकेदारों द्वारा निर्माण के नियम-कानूनों की उपेक्षा की जा रही है, जबकि स्वयं आवास बनाने वाले अनेक लोगों के पास जानकारी का भी अभाव है।

भूकम्प-प्रतिरोधी तकनीक का उपयोग सार्वजनिक इमारतों में तो प्राय: हो जाता है, लेकिन आवासीय भवनों में इसका उपयोग प्राय: नहीं होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जितनी जानकारी अभी उपलब्ध है, यदि केवल इसका उपयोग सुरक्षित निर्माण के लिए किया जाता है तो भविष्य में भूकम्प से होने वाली मानवीय जीवन की क्षति में भारी कमी लाई जा सकती है। दूसरी ओर, यदि निर्माण कार्यों में ऐसा सुधार नहीं किया गया तो भूकम्पीय चेतावनी के अधिक महंगे व खर्चीले उपाय भी मानवीय जीवन बचाने में कारगर सिद्ध नहीं होंगे। विशेषज्ञों की इस चेतावनी को हाल के कुछ भूकम्पों के इस अनुभव के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए कि परंपरागत तकनीकों से बने कुछ भवन तो मजबूती से खड़े रहे, पर जल्दबाजी में बनाए गए कुछ महंगे निर्माण भरभराकर गिर गए।

विशेषकर स्कूल बनाने में हुई लापरवाही बहुत महंगी सिद्ध हो सकती है। अत: स्कूल और अस्पतालों के निर्माण में सुरक्षा को उच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। कुछ क्षेत्रों विशेषकर हिमालय में भूकम्पों के अधिक जानलेवा होने का एक बड़ा कारण यह है कि जहां पहले से पर्यावरण बहुत उजड़ा हुआ है और बहुत से भूस्खलन सक्रिय हैं, वहां भूकम्प से अधिक क्षति होती है। ऐसी स्थितियां आज हिमालय के बड़े इलाके में नजर आती हैं। हाल के वर्षों में भूस्खलनों से होने वाली भीषण क्षति के समाचार वैसे भी बढ़ते ही जा रहे हैं।

भूस्खलन संबंधी राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़े सहजता से हमारे देश में उपलब्ध नहीं हैं, पर बहुत-सी छिटपुट जानकारी विभिन्न पर्वतीय राज्यों में बिखरी हुई है। जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रीय स्तर पर इस आपदा के महत्त्व को समझ कर इससे बचाव के उपायों पर समुचित ध्यान दिया जाए। पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन की एक बड़ी वजह तो यह है कि विभिन्न निर्माण कार्यों, विशेषकर बांध निर्माण और खनन के लिए, विस्फोटकों का अंधाधुंध उपयोग किया जाता है। इसको नियंत्रित और नियमित करना जरूरी है। वन-विनाश भी भूस्खलन की आशंका बढ़ने का एक अन्य बड़ा कारण रहा है। भूस्खलन अपने आप में बड़ी आपदा तो है ही, इससे बाढ़ भी उग्र रूप धारण कर लेती है।

बाढ़ और बाढ़ नियंत्रण के बारे में कुछ नए सिरे से सोचने की जरूरत महसूस की जा रही है। 1953-2010 के बीच देश में बाढ़ नियंत्रण पर करीब सवा लाख करोड़ रुपए खर्च किए गए। इसके बावजूद लगभग पांच करोड़ हेक्टेयर भूमि आज बाढ़ प्रभावित है। जबकि राष्ट्रीय बाढ़ आयोग ने वर्ष 1980 में चार करोड़ हेक्टेयर भूमि बाढ़ प्रभावित होने का अनुमान लगाया गया था। अनेक बड़े बहुउद्देश्यीय बांध बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाए गए थे। पैंतीस हजार किलोमीटर के नदी तटबंध बनाए गए। इसके बावजूद बाढ़ प्रभावित क्षेत्र बढ़ गया।

सवाल है आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसके अनेक कारण बताए जाते हैं। जैसे जल निकासी के रास्तों को अवरुद्ध करते हुए नई बस्तियां बसाना (विशेषकर शहरी क्षेत्रों में ), सड़कों, नहरों और रेल मार्गों के निर्माण के समय निकासी की पर्याप्त व्यवस्था न करना, संसाधनों के अभाव या दुरुपयोग के कारण वर्षा से पहले नालों की सफाई जैसे जरूरी कार्य न करना आदि। अलग-अलग जगहों पर ये सभी कारण महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं, कहीं कम तो कहीं ज्यादा, पर केवल इनके आधार पर यह नहीं समझा जा सकता कि बाढ़ नियंत्रण पर कई हजार करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में इतनी वृद्धि क्यों हुई है। वास्तविकता तो यह है कि बाढ़ का बढ़ता क्षेत्र और इसकी बढ़ती जानलेवा क्षमता को तभी समझा जा सकता है जब बाढ़ नियंत्रण के दो मुख्य उपायों- तटबंधों और बांधों पर खुली बहस द्वारा यह जानने का प्रयास किया जाए कि अनेक स्थानों पर क्या बाढ़ नियंत्रण के इन उपायों ने ही बाढ़ की समस्या को नहीं बढ़ाया है और उसे अधिक जानलेवा बनाया है?

हमारे यहां वर्षा की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि यदि उसके जल के संग्रहण और संरक्षण की उचित व्यवस्था नहीं की गई तो यह जल बहुत-सी मिट्टी बहा कर निकट की नदी की ओर वेग से दौड़ेगा और नदी में बाढ़ आ जाएगी। चूंकि अधिकतर जल न एकत्र होगा न धरती में रिसेगा, अत: कुछ समय बाद जल संकट उत्पन्न होना स्वाभाविक है। इन दोनों विपदाओं को कम करने या दूर करने के लिए जीवनदायी जल का अधिकतम संरक्षण और संग्रहण आवश्यक है।
दूसरा महत्त्वपूर्ण कदम यह है कि वर्षा का जो शेष पानी नदी की ओर बह रहा है, उसके अधिकतम संभव हिस्से को तालाबों या पोखरों में एकत्र कर लिया जाए। इस पानी को मोड़ कर सीधे खेतों में भी लाया जा सकता है। तालाब से होने वाले सीपेज का भी उपयोग हो सके, इसकी व्यवस्था हो सकती है। एक तालाब का अतिरिक्त पानी दूसरे में पहुंच सके और इस तरह तालाबों की एक शृंखला बन जाए, यह भी कुशलतापूर्वक करना संभव है।

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