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संपादकीय: आफत की बरसात

पटना सहित उत्तर बिहार के कई जिलों में पिछले तीन-चार दिनों से लगातार हुई बारिश ने लोगों के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

पटना में एक बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि अगर बरसात पूरी तरह रुक भी जाती है तो गलियों-मुहल्लों में जमा पानी कैसे निकलेगा! (फोटो- फाइनेंशियल एक्सप्रेस)

बिहार और उत्तर प्रदेश में बरसात ने जिस तरह का कहर ढाया है, वह किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा से कम नहीं है। लेकिन देखने की जरूरत यह भी है कि ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए हमारी सरकारी व्यवस्था कितनी तैयारी करती है। बिजली गिरने, बाढ़ में डूबने, दीवार गिरने से लेकर करंट की चपेट में आने की वजह से उत्तर प्रदेश में अस्सी और बिहार में करीब तीस लोगों की मौतें और कई शहरों में पानी भर जाने से सड़क और रेल यातायात सहित बाकी जनजीवन ठप होने की स्थिति यह बताने के लिए काफी है कि विकास के नाम पर अच्छी सड़कों और ऊंची इमारतों का हवाला देने की हकीकत जमीन पर क्या है।

पटना सहित उत्तर बिहार के कई जिलों में पिछले तीन-चार दिनों से लगातार हुई बारिश ने लोगों के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। खासतौर पर पटना में हालत यह है कि मुख्य सड़कों से लेकर ज्यादातर मुहल्लों में तीन से पांच फुट पानी भर गया और भूतल पर रहने वालों को घर छोड़ना पड़ा। बाजारों और अस्पतालों तक में पानी घुस गया, बिजली और पानी की आपूर्ति में भी व्यापक बाधा आई है और एक तरह से भूखे-प्यासे रहने की हालत में पहुंचे लोगों को आपात मदद की जरूरत है।

आखिर बरसात की वजह से किसी शहर के डूबने की स्थिति क्यों पैदा हो जा रही है? पटना में एक बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि अगर बरसात पूरी तरह रुक भी जाती है तो गलियों-मुहल्लों में जमा पानी कैसे निकलेगा! फिलहाल मुख्य वजह यह है कि पटना से सटी गंगा, पुनपुन, गंडक और सोन नदियां पहले से ही खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं और शहर के नालों का पानी उनमें भी नहीं निकल पा रहा है।

ऐसी स्थिति में सरकार के पास लोगों की सुरक्षा और उनका जीवन बचाने के क्या इंतजाम हैं? शहरी नियोजन में जल-निकासी की समुचित व्यवस्था एक सबसे अहम शर्त होनी चाहिए। लेकिन चारों तरफ ऊंची इमारतों का संजाल खड़ा हो जाता है, मगर इस पहलू पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा जाता कि बरसात या बाढ़ की हालत में पानी के निकलने का रास्ता क्या होगा। पटना में घनी आबादी वाले इलाकों में पहले ही पानी की निकासी की व्यवस्था को संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है। फिर आपदा प्रबंधन विभाग की तैयारी भी सवालों के घेरे में है।

भूकम्प या बाढ़ जैसी आपदाओं के बारे में हर बार कोई निश्चित पूर्वानुमान लगा पाना मुमकिन नहीं होता है, लेकिन इन्हें प्राकृतिक उथल-पुथल का एक अनिवार्य हिस्सा मान कर इनसे बचाव के इंतजाम करना अपने बस में जरूर होता है। पर यह शहरी जीवन के अभ्यास में नहीं होने का ही नतीजा है कि देश के किसी हिस्से में अचानक काफी ज्यादा बरसात हो जाती है और समूचा इलाका डूबने के कगार पर आ जाता है।

हाल के वर्षों में मुंबई या चेन्नई जैसे महानगरों में भारी बारिश की वजह से जो हालत देखी गई, उसकी वजहें किसी से छिपी नहीं हैं। फिर भी देश के दूसरे इलाकों में सरकारें ऐसी तबाही को ध्यान में रख कर बचाव और राहत के दूसरे इंतजामों सहित जल-निकासी के पर्याप्त इंतजाम करना जरूरी नहीं समझतीं। हालांकि बरसात के दौरान मुश्किल केवल शहरी इलाकों में भयानक बाढ़ जैसे हालात खड़े होने की ही नहीं होती, बल्कि बिजली गिरने, पानी में करंट फैलने आदि से भी मौतें होती हैं, लेकिन अगर सिर्फ पानी की सहज निकासी की व्यवस्था को दुरुस्त कर लिया जाए तो ऐसी आपदाओं के दौरान आधी से ज्यादा समस्याओं को नियंत्रण में लाया जा सकता है।

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