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संपादकीय: तूफान से तबाही

बिगड़ते मौसम को लेकर मौसम विभाग आगाह कर रहता है।

Author Published on: November 12, 2019 2:30 AM
तटीय राज्य होने की वजह से पश्चिम बंगाल को बंगाल की खाड़ी में उठने वाले तूफानों का अक्सर सामना करना पड़ता है। (सांकेतिक तस्वीर)

चक्रवाती तूफान ‘बुलबुल’ ने रविवार को पश्चिम बंगाल के बड़े हिस्से और बांग्लादेश के तटीय इलाकों में जिस तरह से कहर बरपाया है, उससे राज्य के आपदा प्रबंधन की पोल खुल गई है। ऐसा नहीं है कि यह चक्रवाती तूफान कोई अचानक आया हो, इसके बारे में मौसम विभाग पहले से ही संकेत दे चुका था। लेकिन समय रहते उन इलाकों को खाली नहीं कराया गया जहां तूफान से सबसे ज्यादा तबाही हुई है। अभी तक दस लोगों के मारे जाने की खबर है, लेकिन बेघरों की संख्या लाखों में है। सबसे ज्यादा तबाही तो दक्षिण चौबीस परगना जिले में हुई है, जहां मछुआरों की एक पूरी बस्ती ही तूफान में उड़ गई।

इस चक्रवात ने राज्य के नौ जिलों को अपनी चपेट में ले लिया। ज्यादा तबाही इसलिए भी हुई कि तूफान शनिवार देर रात आया और रविवार तड़के उसने उग्र रूप धारण कर लिया। इसलिए रात को लोग बचाव के लिए कोई उपाय भी नहीं कर पाए। पश्चिम बंगाल में इस साल मई में तूफान ‘फनी’ आया था और तब भी भारी नुकसान हुआ था। तटीय राज्य होने की वजह से पश्चिम बंगाल को बंगाल की खाड़ी में उठने वाले तूफानों का अक्सर सामना करना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि राज्य में आपदा प्रबंधन के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए जाते?

इस वक्त तूफान पीड़ित जिलों में हालात खराब हैं और बड़े पैमाने पर राहत कार्यों की जरूरत है। पेड़ों और बिजली के खंभे गिरने से तबाही वाले इलाकों में पहुंचना भी मुश्किल भरा साबित हो रहा है। ज्यादा चिंता की बात यह है कि तूफान से बड़ी संख्या में मकानों को नुकसान पहुंचा है और इनमें भी कच्चे घरों की तादाद काफी है। हालांकि केंद्र सरकार ने भी राज्य को हरसंभव मदद देने की बात कही है। लेकिन अक्सर देखने में आता है कि ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के बाद दो-तीन दिन तक तो राहत काम चलते हैं, बस्तियों में नेताओं-मंत्रियों के चक्कर लगते हैं, तूफान पीड़ित इलाकों के हवाई दौरे होते हैं, लेकिन सरकारें फिर से पुराने ढर्रे पर लौट आती हैं और लोग राहत को तरसते रहते हैं।

ऐसे में जिस तरह की जिम्मेदार सरकार और प्रशासन की लोगों को आस होती है वह नदारद दिखता है। हालांकि बंगाल की खाड़ी में एक जहाज से पचहत्तर लोगों को बचाया भी गया। अगर सरकार और प्रशासन समय पर चेते होते तो लोगों को हताहत होने से बचाया जा सकता था। ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए राज्यों के पास पुख्ता सूचना तंत्र, मौसम विभाग की सटीक सूचनाएं और आपदा प्रबंधन के पर्याप्त इंतजाम होने चाहिए। लेकिन ज्यादातर जगहों पर देखने में यही आता है कि सब कुछ हो जाने के बाद ही हमारी आंखें खुलती हैं। हालांकि चक्रवाती तूफान जैसी आपदा से निपटने में ओड़िशा से सबक लेना चाहिए जिसने कुछ महीनों पहले ही ऐसी आपदा से सुव्यवस्थित तरीके से निपटा था।

हालांकि भारत में अब मौसम विभाग की भविष्यवाणियां और चेतावनियां पहले के मुकाबले ज्यादा सटीक साबित होती हैं। बिगड़ते मौसम को लेकर मौसम विभाग आगाह कर रहता है। लेकिन अब मौसम चक्र में आए बदलाव और बढ़ते तापमान से चक्रवाती तूफान, तेज आंधी-बारिश जैसे जो चक्र चल रहे हैं वह मौसम विज्ञानियों के लिए भी एक चुनौती है। पिछले कुछ सालों में खासतौर से उत्तर भारत को जिस तरह की प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा है, उसमें मौसम तंत्र से जुड़ी कई घटनाएं ऐसी हुर्इं जो पहले कभी नहीं देखी गर्इं। मौसम अब एक तरह से चुनौती बन गया है। इसलिए प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के इंतजाम भी पुख्ता रखने की जरूरत है।

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