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संपादकीय: गहराती मंदी

आइआइपी बता रहा है कि न केवल उद्योग, बल्कि कृषि क्षेत्र की हालत भी खराब है और उसमें भी कोई मांग नहीं है।

Author Published on: November 13, 2019 2:24 AM
एक महीने में ही 2.9 फीसद की और गिरावट गंभीर चिंता का विषय है।

भारत में मंदी किस कदर गहराती जा रही है, इसकी तस्वीर सोमवार को आए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आइआइपी) के आंकड़ों से साफ हो जाती है। आइआइपी बता रहा है कि सिंतबर में उद्योग जगत का ऐसा भट्ठा बैठा जिसने कारोबारियों से लेकर अर्थशास्त्रियों तक की नींद उड़ा दी। सिंतबर में औद्योगिक उत्पादन में 4.3 फीसद तक की गिरावट दर्ज की गई, जो पिछले आठ साल में सबसे कम स्तर है। इससे ठीक एक महीने पहले यानी अगस्त में औद्योगिक उत्पादन में 1.4 फीसद की गिरावट आई थी। इसलिए एक महीने में ही 2.9 फीसद की और गिरावट गंभीर चिंता का विषय है। इससे यह साफ हो गया है कि बाजार से मांग नदारद है और इसीलिए कारखानों से लेकर छोटी इकाइयों तक में उत्पादन गिरता जा रहा है।

आइआइपी के ताजा आंकड़े अनुमान से कहीं ज्यादा खराब हैं। यह मंदी के और गहराने का संकेत है। साल के हिसाब से देखें तो चालू वित्त वर्ष में आइआइपी में कुल वृद्धि 1.3 फीसद की ही रही है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 5.2 फीसद था। ये हालात बता रहे हैं कि अर्थव्यवस्था को गति देने वाले सारे इंजन ठप होने की हालत में पहुंचते जा रहे हैं।

इस खतरे के गंभीर रूप धारण करने का संकेत अगस्त में ही मिल गया था जब औद्योगिक उत्पादन इक्यासी महीने के न्यूनतम स्तर तक चला गया था। यों मंदी की आहट साल भर से थी और सबसे पहले इसका असर देश के आॅटोमोबाइल सेक्टर में देखने को मिलने लगा था। लेकिन तब समय रहते कदम नहीं उठाए गए, और इसे कभी तात्कालिक तो कभी चक्रीय प्रभाव करार देकर नजरअंदाज किया जाता रहा। नतीजा यह हुआ कि हालात बेकाबू होते गए और अगस्त-सिंतबर में उद्योगों का चौपट हाल देखने को मिला।

आइआइपी बता रहा है कि न केवल उद्योग, बल्कि कृषि क्षेत्र की हालत भी खराब है और उसमें भी कोई मांग नहीं है। उद्योग और कृषि की हालत खस्ता होने से अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्र खनन और बिजली क्षेत्र में भी मंदी का खासा असर है। पिछले महीने यानी अक्तूबर में बिजली की मांग में 13.2 फीसद की गिरावट मंदी का हाल बताने के लिए काफी है। बिजली की मांग में पिछले बारह साल में इतनी गिरावट पहली बार देखी गई है। अगस्त में माना जा रहा था कि अगले दो-तीन महीनों में त्योहारों की वजह से बाजार में मांग बनेगी और उत्पादन में सुधार होगा। लेकिन उत्पादन बढ़ने के बजाय घटता चला गया। मांग निकलने की जितनी उम्मीद थी, वह धरी रह गई।

अर्थव्यवस्था की हालत सुधारने के लिए यों सरकार ने टुकड़ों-टुकड़ों में कदम उठाने की पहल तो की है, लेकिन देर बहुत हो चुकी है। दो महीनों के दौरान बैंकों से लेकर आवास क्षेत्र के लिए पैकेज दिए गए हैं। उद्योगों को राहत देने के लिए कारपोरेट करों में कटौती जैसा बड़ा कदम भी उठाया गया है। ये कितने कारगर होते हैं, यह वक्त बताएगा। पर बड़ी समस्या है मांग को लेकर, बाजार में मांग कैसे बने? देश में मांग सृजित करने वाला सबसे बड़ा वर्ग मध्यवर्ग होता है। लेकिन इस वक्त यह तबका खुद डरा हुआ है।

लाखों लोगों के पास रोजगार नहीं है, तो खर्च करने के लिए पैसा आएगा कहां से। ग्रामीण अर्थव्यवस्था का और बुरा हाल है। लोगों की आमद कैसे बढ़ाई जाए, इसके लिए कदम उठाने की जरूरत है। बैंकों में पैसा रखने को लेकर लोगों के मन में जो डर और अविश्वास बैठ गया है, उसका असर यह हुआ है कि लोग डर के मारे बचत पर जोर दे रहे हैं। ऐसे में कैसे मांग निकलेगी, यह सोचने की बात है।

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