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शराब का कहर

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जहरीली शराब ने फिर कहर बरपाया है। सहारनपुर, शामली, कुशीनगर, हरिद्वार, रुड़की सहित कई जगहों पर जहरीली शराब पीने से बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं। अस्पतालों में इलाज करा रहे पीड़ितों की तादाद तो और भी ज्यादा है। सबसे ज्यादा मौतें हरिद्वार और इससे सटेउत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में हुई हैं।

Author February 11, 2019 3:08 AM
सहारनपुर में जहरीली शराब पीन से मारे गए लोगों के घरों में पसरा मातम। (PTI Photo)

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जहरीली शराब ने फिर कहर बरपाया है। सहारनपुर, शामली, कुशीनगर, हरिद्वार, रुड़की सहित कई जगहों पर जहरीली शराब पीने से बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं। अस्पतालों में इलाज करा रहे पीड़ितों की तादाद तो और भी ज्यादा है। सबसे ज्यादा मौतें हरिद्वार और इससे सटेउत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में हुई हैं। यह घटना बताती है कि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में जहरीली शराब का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है। जाहिर है, ये राज्य शराब माफिया की गिरफ्त में हैं। स्थानीय प्रशासन और पुलिस तो आंखें मूंदे हुए हैं और किसी पर भी कार्रवाई कर पाने में लाचार है। हमेशा से होता यही आया है कि जब भी इस तरह की घटनाएं होती हैं तो फौरी और रस्मी तौर पर कुछ अधिकारी-कर्मचारी निलंबित किए जाते हैं और मृतकों के परिजनों को मुआवजा देकर पिंड छुड़ा लिया जाता है, लेकिन ऐसी कार्रवाई किसी पर नहीं होती, जिससे कोई सबक ले सके। वही अब भी हुआ है।

जहरीली शराब का कारोबार करने वालों का जाल काफी बड़ा है। जिस तरह यह धंधा चलता आ रहा है उससे तो लगता है कि यह व्यवस्था का हिस्सा बन गया है। और जहरीली शराब ही क्यों, इस तरह के कई अवैध कारोबार होते हैं जिनके बारे में सरकारें, प्रशासन और पुलिस सब जानते हैं, लेकिन उन पर लगाम नहीं लगाते। यह कोई छिपी बात नहीं है कि अवैध शराब का धंधा स्थानीय प्रशासन और पुलिस की मिलीभगत से ही चल पाता है। कच्ची शराब का सेवन आमतौर पर निचले तबके के लोग करते हैं, क्योंकि यह सस्ती होती है और आसानी से मिल जाती है। इसलिए निम्न-वर्गीय बस्तियों, झुग्गी बस्तियों में कच्ची शराब के मटके ज्यादा चलते हैं। पाउचों तक में शराब बिकती है। ग्रामीण इलाकों में कच्ची शराब का कारोबार बड़े पैमाने पर चलता है। पर पुलिस और प्रशासन इन्हें इसलिए चलने देता है, क्योंकि ये धंधे उगाही के बड़े स्रोत होते हैं। जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है तो उसे रफा-दफा कर दिया जाता है और थोड़े दिन बाद फिर से धंधा शुरू हो जाता है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन कठघरे में आएगा ही।

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जहरीली शराब से हुई मौतें बता रही हैं कि इन राज्यों की सरकारों ने सत्ता में आने के बाद शराब माफिया पर डंडा चलाने की हिम्मत नहीं दिखाई, बल्कि शराब माफिया के सामने हाथ खड़े कर दिए। अगर शराब माफिया के खिलाफ अभियान चलता तो लोग मारे जाने से बच सकते थे। शराब की बिक्री राज्य सरकारों के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत होती है, लेकिन अवैध शराब का कारोबार करने वालों से जो उगाही होती है, वह भी मामूली नहीं होती। इसलिए चाहे किसी पार्टी की सरकार सत्ता में रहे, शराब माफिया पर इसका कोई असर नहीं पड़ता और इसीलिए अवैध शराब के धंधे पर लगाम नहीं लग पाती। यह कोई पहला मौका नहीं है जब जहरीली शराब के कारण इतनी मौतों की खबर आई हो। चार साल पहले लखनऊ के मलिहाबाद में जहरीली शराब से पैंतीस से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। लेकिन शर्म की बात तो यह है कि ऐसे बड़े हादसों के बाद भी सरकार की आंखें नहीं खुलतीं। पिछली घटनाओं से भी कोई सबक नहीं लिया जाता। अगर सरकार ठान ले तो जहरीली शराब बेचने वालों का सफाया करना कोई मुश्किल काम नहीं है!

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