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हादसों के उद्योग

राजधानी दिल्ली के मोतीनगर इलाके में एक फैक्टरी में हुआ हादसा और उसमें सात लोगों की मौत से एक बार फिर यही साफ हुआ है कि नियम-कायदों को ताक पर रख कर कैसे औद्योगिक इकाइयों का संचालन हो रहा है और वहां लोगों की जान की कोई कीमत शायद नहीं है। वरना यह कैसे संभव हो पाता है कि इस तरह के तमाम हादसों के दौरान लोगों के मारे जाने के तथ्य को ध्यान में रखना और कम से कम उसके बाद बचाव के इंतजाम करना जरूरी नहीं समझा जाता है।

Author January 5, 2019 3:12 AM
मोतीनगर इलाके में फैक्टरी में हुए हादसे के बाद बचाव कार्य में जुटे अधिकारी। (सोर्स- एएनआई)

राजधानी दिल्ली के मोतीनगर इलाके में एक फैक्टरी में हुआ हादसा और उसमें सात लोगों की मौत से एक बार फिर यही साफ हुआ है कि नियम-कायदों को ताक पर रख कर कैसे औद्योगिक इकाइयों का संचालन हो रहा है और वहां लोगों की जान की कोई कीमत शायद नहीं है। वरना यह कैसे संभव हो पाता है कि इस तरह के तमाम हादसों के दौरान लोगों के मारे जाने के तथ्य को ध्यान में रखना और कम से कम उसके बाद बचाव के इंतजाम करना जरूरी नहीं समझा जाता है। गुरुवार रात मोतीनगर इलाके के सुदर्शन पार्क स्थित एक पंखे की फैक्टरी में कंप्रेशर फटने से हुए धमाके के बाद वह समूची दो मंजिला इमारत ढह गई। इसकी चपेट में एक कबाड़ का गोदाम भी आ गया। इस हादसे में छह लोगों की जान चली गई और एक दर्जन से ज्यादा लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका है। यह समझना मुश्किल है कि एक ऐसी फैक्टरी रिहाइशी इलाके में कैसे चल रही थी, जिसमें हादसे की स्थिति में न केवल उसके भीतर काम करने वाले लोगों, बल्कि आसपास की इमारतों में रहने वालों पर खतरे की आशंका पहले से बनी हुई थी।

कहने को ऐसी घटनाओं को हादसा कह दिया जाता है, लेकिन सच यह है कि इस तरह की अमूमन सभी घटनाएं बहुस्तरीय लापरवाहियों का नतीजा होती हैं। ज्यादातर औद्योगिक इकाइयों में आग लगने या दूसरी वजहों से होने वाली दुर्घटना की स्थिति में बचाव के इंतजाम पर्याप्त नहीं होते। बल्कि कई जगहों पर हुए हादसों के बाद लोगों को इसलिए अपनी जान गंवानी पड़ गई कि वहां से निकलने के रास्ते या तो बेहद संकरे थे या फिर कोई रास्ता था ही नहीं। ऐसी हर फैक्टरी या फिर व्यावसायिक प्रतिष्ठान वाली इमारतों में अग्नि शमन विभाग की ओर समय-समय पर होने वाली जांच और उसके सुरक्षित होने से संबंधित प्रमाणपत्र की जरूरत होती है। लेकिन ऐसा लगता है कि न केवल ऐसे भवनों या फैक्टरियों या कंपनियों के मालिक इस तरह की नियमित जांच को एक जरूरी काम नहीं मानते हैं, बल्कि संबंधित महकमे भी या तो इस काम में टालमटोल करते हैं या मिलीभगत से वहां मौजूद खामियों की अनदेखी कर देते हैं। सवाल है कि अगर जानबूझ कर नियम-कायदों को ताक पर रख कर फैक्टरियों का संचालन होता है और उनकी अनदेखी प्रशासन के संबंधित महकमे और उनके अधिकारी भी करते हैं तो यह किस तरह आपराधिक लापरवाही से कम है!

किसी हादसे का सबक यह होना चाहिए कि उसके बाद किन्हीं परिस्थितियों में उसी तरह की दुर्घटना से बचाव के पर्याप्त इंतजाम किए जाएं। इसमें नियम-कायदों की कसौटी पर किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं किए जाने का सवाल शामिल है। लेकिन दिल्ली जैसे शहर में अक्सर ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं, जिनसे यही लगता है कि हादसों और उनकी वजहों को लेकर न तो संबंधित संस्थानों या इकाइयों के मालिक या प्रबंधन को संवेदनशील होना जरूरी लगता है, न ही प्रशासन के संबंधित महकमों को वक्त पर सही तरीके से जांच और कार्रवाई सुनिश्चित करना अपनी ड्यूटी का हिस्सा लगता है। क्या यही कारण नहीं है कि फैक्टरी मालिकों को नियम-कायदों को ताक पर रख कर काम चलाते रहने की हिम्मत नहीं आती है? यह बेवजह नहीं है कि आए दिन बेहद मामूली से लेकर गंभीर लापरवाहियों की वजह से आग लगने या इमारतें ढहने की घटनाएं होती रहती हैं और उसमें नाहक लोगों की जान चली जाती है। जब तक इस तरह के तमाम कारखानों पर नजर रखने वाले संबंधित महकमों की जवाबदेही तय नहीं होगी, ऐसे हादसों से निजात पाना मुश्किल बना रहेगा।

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