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संपादकीय: जानलेवा सड़कें

गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से एक्सप्रेस-वे पर लगातार हादसे और उनमें लोगों की मौत की खबरें आती रही हैं। आगरा-लखनऊ और दिल्ली-आगरा एक्सप्रेस वे पर हादसे जिस रफ्तार से हो रहे हैं, वह अब चिंता की एक बड़ी वजह चुकी है।

Author April 23, 2019 2:09 AM
आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर मैनपुरी के पास हुआ हादसा। फोटो सोर्स : एएनआई

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में हुए बड़े सड़क हादसे ने एक बार फिर इस गहराती समस्या की ओर ध्यान दिलाया है कि सड़क और रफ्तार के असंतुलन की वजह से कितने लोग नाहक ही अपनी जान गंवाएंगे! शनिवार की रात आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे पर दिल्ली से वाराणसी जा रही एक बस और ट्रक की भयानक टक्कर में एक बच्ची सहित सात लोगों की मौत हो गई और करीब छत्तीस लोग बुरी तरह घायल हो गए। हो सकता है कि यह भी आए दिन होने वाले सड़क हादसों में शुमार कर लिया जाए, लेकिन क्या यह कोई अनदेखी करने लायक समस्या रह गई है? सच कहें तो सड़क पर रोजाना होने वाले हादसों और उनमें लोगों की मौत की घटनाओं को सामान्य सुरक्षा-इंतजाम और यातायात व्यवस्था में चौकसी और निगरानी के जरिए रोका जा सकता है। लेकिन अक्सर सड़कों पर वाहनों की छोटी या फिर बड़ी दुर्घटनाओं को भी सामान्य मान कर कागजी कार्रवाई और बाकी औपचारिकताएं पूरी कर ली जाती हैं और फिर अगले किसी गंभीर हादसे के सामने आने तक के लिए शायद इसी प्रक्रिया का इंतजार किया जाता है!

गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से एक्सप्रेस-वे पर लगातार हादसे और उनमें लोगों की मौत की खबरें आती रही हैं। आगरा-लखनऊ और दिल्ली-आगरा एक्सप्रेस वे पर हादसे जिस रफ्तार से हो रहे हैं, वह अब चिंता की एक बड़ी वजह चुकी है। हाल ही में सूचना का अधिकार कानून के तहत सामने आई एक जानकारी के मुताबिक पिछले अठारह महीनों में लगभग दो हजार हादसे हुए, जिनमें करीब दो सौ लोगों की जान चली गई। आंकड़ों के मुताबिक एक्सप्रेस-वे पर हर रोज औसतन चार हादसे हुए और तीन दिन में एक व्यक्ति की मौत हो गई। पिछले साल लगभग डेढ़ सौ हादसे अकेले पशुओं के अचानक सड़क पर आ जाने से हुए। जबकि एक्सप्रेस-वे पर दोनों तरफ पशुओं को रोकने के लिए बाड़ लगी है। आगरा-दिल्ली एक्सप्रेस-वे की हालत इससे अलग नहीं है। आरटीआई से ही यह सामने आया कि यमुना एक्सप्रेस-वे पर अगस्त 2012 से लेकर 31 मार्च, 2018 के बीच करीब पांच हजार हादसे हुए, जिनमें सात सौ से ज्यादा लोगों की जान चली गई और साढ़े सात हजार से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। सवाल है कि इतनी तादाद में लगातार हादसों के बावजूद सरकार और संबंधित महकमे की नींद क्यों नहीं खुलती!

इन निर्बाध सड़कों पर हादसों की वजहों की पहचान भी हुई है। इनमें निर्धारित से काफी ज्यादा तेज गति से वाहन चलाना, गाड़ी चलाने के दौरान झपकी आना और कई बार अचानक पशुओं का सामने आ जाना मुख्य कारणों के रूप में दर्ज किए गए हैं। सवाल है कि इन चिह्नित कारणों के बावजूद इनके हल के लिए क्या इंतजाम किए गए हैं? अगर एक्सप्रेस-वे पर वाहन की रफ्तार बेलगाम हो जाती है तो उन पर निगरानी या उन्हें रोकने के क्या इंतजाम हैं? पशु अचानक सड़क पर न आएं, इसके लिए बाड़ हैं। फिर वे कैसे सड़क पर तेज रफ्तार वाहनों के सामने आ जाते हैं? लंबी दूरी तक खुली सड़कें ड्राइवर के ध्यान को स्थिर, लेकिन शरीर और दिमाग को सुस्त बना सकती हैं। इस पहलू के हल के क्या किया जा रहा है? बहुत अच्छी सड़कें यातायात या आवाजाही को आसान और सुगम बना सकती हैं, लेकिन उन पर सुरक्षित सफर के लिए सबसे ज्यादा सावधानी बरतना वाहन चालक की ही जिम्मेदारी है। इसके बावजूद यातायात की व्यवस्था के सुचारु रूप से संचालन के लिए जरूरी है कि संबंधित महकमे हर इंतजाम और जरूरी होने पर सख्त कार्रवाई करें, ताकि नाहक ही लोगों की जान जाने की घटनाओं पर काबू पाया जा सके।

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