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संपादकीय: तेल का संकट

ईरान के अलावा वेनेजुएला भी अमेरिका की आंख की किरकिरी बना हुआ है और पिछले तीन महीने से अमेरिका वेनेजुएला की निर्वाचित सरकार का तख्तापलट करवा कर वहां अपनी पिट्ठू सरकार बनवाने की कोशिशों में लगा है। ऐसे में वेनेजुएला से भी तेल खरीद बंद है।

Author April 24, 2019 1:21 AM
इस संकट की आहट पिछले साल मई से ही मिलने लगी थी।

ईरान से कच्चा तेल खरीदने को लेकर अमेरिका ने भारत सहित कई देशों पर लगाई पाबंदी पर जो ढील दे रखी थी, उसकी अवधि दो मई को खत्म हो जाएगी। इसके बाद भारत ईरान से कच्चा तेल नहीं खरीद पाएगा। अगर फिर भी भारत ऐसा करता है तो अमेरिका के साथ उसके रिश्ते बिगड़ेंगे। भारत के लिए यह गंभीर संकट का वक्त है। ये हालात इस बात का संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दिनों में देश में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे और महंगाई भी। भारत को दूसरे देशों से कच्चा तेल खरीदना होगा। इससे आयात बिल बढ़ेगा और राजकोषीय संतुलन बिगड़ेगा। पिछले कुछ महीनों में रुपए में जो सुधार आने लगा था, उस पर फिर से असर पड़ेगा। कुल मिला कर भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अमेरिका का यह फैसला भारी पड़ने वाला है। तेल का यह संकट इसलिए भी गहराने वाला है कि भारत लंबे समय से जिन दो प्रमुख तेल उत्पादक देशों से कच्चा तेल खरीदता रहा है वे अमेरिका के निशाने पर हैं। ईरान के अलावा वेनेजुएला भी अमेरिका की आंख की किरकिरी बना हुआ है और पिछले तीन महीने से अमेरिका वेनेजुएला की निर्वाचित सरकार का तख्तापलट करवा कर वहां अपनी पिट्ठू सरकार बनवाने की कोशिशों में लगा है। ऐसे में वेनेजुएला से भी तेल खरीद बंद है। अपने दुश्मन देशों से निपटने की अमेरिका की यह रणनीति भारत की ऊर्जा सुरक्षा और र्इंधन जरूरतों के लिए मुश्किलें पैदा कर रही है।

इस संकट की आहट पिछले साल मई से ही मिलने लगी थी, जब अमेरिका और ईरान के रिश्ते बिगड़ गए थे। जुलाई 2015 में ईरान और सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के बीच यह करार हुआ था कि ईरान अपना एटमी कार्यक्रम छोड़ देगा और इसके एवज में उस पर लगे प्रतिबंध हटा लिए जाएंगे। यह करार बराक ओबामा के कार्यकाल में हुआ था। लेकिन पिछले साल मई में डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर समझौते के उल्लंघन आरोप लगाते हुए अमेरिका को इससे अलग कर लिया। इसके बाद से ही ट्रंप ने ईरान पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। ईरान की अर्थव्यवस्था पर चोट करने के लिए ट्रंप ने पहला कदम उसका तेल निर्यात बंद करवाने का उठाया। ट्रंप ने भारत, चीन, जापान, तुर्की, इटली, दक्षिण कोरिया और ताइवान को छह महीने के लिए छूट दी थी। लेकिन अब यह अवधि दो मई को खत्म हो जाएगी। हैरानी की बात तो यह है कि अमेरिका ने खुली धमकी दे रखी है कि दो मई के बाद इनमें से जो भी देश ईरान से तेल खरीदेगा अमेरिका उसके खिलाफ कार्रवाई करेगा।

सवाल है तब ऐसे में भारत क्या करे। भारत ईरान के कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार है और सबसे बड़ी सहूलियत यह है कि उसे यूरो और रुपए में भुगतान करता है। भारत के कुल आयात में ईरान और वेनेजुएला का हिस्सा करीब अठारह फीसद बैठता है। हालांकि भारत इस कमी की भरपाई सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और नाइजीरिया से आयात बढ़ा कर सकता है। हालात बता रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में आने वाले दिन उठापठक भरे हो सकते हैं। ऐसे में भारत के लिए समस्या यह होगी कि तेल खरीद के मामले में उसकी अमेरिका के इशारों पर चलने वाले देशों पर निर्भरता बढ़ेगी। हालांकि भारत के लिए आसान नहीं है कि अमेरिका के दबाव में आकर वह ईरान से अपने रिश्ते कमजोर कर ले। भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह परियोजना का सबसे बड़ा रणनीतिक भागीदार है। ऐसे में जरूरत पूरी करने के लिए अतिरिक्त तेल खरीद का बंदोबस्त करना और अमेरिका से भी पटरी बैठाकर चलना भारत के लिए बड़ी चुनौती है।

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