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संपादकीय: भीड़ और कानून

सवाल है कि क्या भीड़ कानून को अपने हाथ में इसलिए ले रही है कि उसे कानून के शासन में, पुलिस तंत्र में, न्याय प्रणाली में कोई भरोसा नहीं रह गया है? क्या ऐसा करने वालों में कानून का कोई खौफ नहीं रह गया है?

Author Published on: July 22, 2019 1:10 AM
बिहार के छपरा में मॉब लिंचिंग (फोटो सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस)

देश में जिस तरह से भीड़ के ‘न्याय’ की संस्कृति चल पड़ी है और लोगों को पीट-पीट कर मौत के घाट उतारने की बर्बर घटनाएं सामने आ रही हैं, वह चिंताजनक तो है ही, एक लोकतांत्रिक और सभ्य राष्ट्र के लिए शर्मनाक भी है। इस तरह की घटनाओं का ग्राफ जिस तेजी से बढ़ रहा है, उससे साफ है कि देश में कानून-व्यवस्था का कोई मतलब नहीं रह गया है। उन्मादी जंगल राज कायम कर रहे हैं और सरकारें चुपचाप देख रही हैं। इस तरह की घटनाएं कानून-व्यवस्था बनाए रखने का दावा करने वाली सरकारों के लिए किसी कलंक से कम नहीं हैं। तीन दिन पहले बिहार के छपरा और वैशाली जिले में भीड़ ने जिस तरह से चार लोगों को पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया, उससे साफ है कि पुलिस और प्रशासन ऐसी घटनाओं को रोक पाने में एकदम नाकाम साबित हुआ है। छपरा जिले के एक गांव में जिन तीन लोगों को गांव वालों ने मार डाला, उन पर मवेशी चोरी का आरोप था, जबकि वैशाली में जो युवक मारा गया उसके बारे में कहा गया है कि वह बैंक लूटने आया था। पिछले हफ्ते ही राजस्थान के अलवर जिले में मामूली-सी घटना के बाद एक मोटर साइकिल सवार को भीड़ ने मार डाला था।

सवाल है कि क्या भीड़ कानून को अपने हाथ में इसलिए ले रही है कि उसे कानून के शासन में, पुलिस तंत्र में, न्याय प्रणाली में कोई भरोसा नहीं रह गया है? क्या ऐसा करने वालों में कानून का कोई खौफ नहीं रह गया है? अगर ऐसा है तो यह वाकई कानून के शासन के लिए बड़ी और खुली चुनौती है। भीड़ के हाथों अब तक जितनी भी हत्याएं हुई हैं, उनमें ज्यादातर मामले बच्चा चोरी, पशु चोरी जैसी घटनाओं से जुड़े हैं। पिछले तीन साल में सबसे ज्यादा सक्रिय गोरक्षक हुए और गोरक्षा के नाम पर कई ‘गोतस्कर’ मौत के घाट उतार दिए गए। गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में ये घटनाएं ज्यादा दर्ज हुई हैं। आंकड़े बता रहे हैं कि सन 2010 से अब तक गोहत्या के शक में भीड़ के हमले की सत्तासी घटनाएं हुर्इं, जिनमें चौंतीस लोग मारे गए। गंभीर बात यह है कि इनमें ज्यादातर घटनाएं 2014 के बाद की हैं। लेकिन किसी भी मामले में अब तक कोई ऐसी सख्त कार्रवाई होती नहीं दिखी जिससे कानून हाथ में लेने वालों को कड़ा संदेश जाता। जाहिर है, सरकारों के इस लचर रवैए से तो ऐसा करने वालों का दुस्साहस और बढ़ेगा ही!

भीड़ हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर संज्ञान लेते हुए पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि हर जिले में पुलिस अधीक्षक स्तर के एक अधिकारी की नियुक्ति की जाए, खुफिया सूचनाएं जुटाने के लिए विशेष कार्य बल बनाए जाएं जो सोशल मीडिया में चल रही गतिविघियों पर पैनी भी नजर रखें। सर्वोच्च अदालत ने ‘भीड़ तंत्र’ से निपटने के लिए सरकार को कानून बनाने को भी कहा था। लेकिन हुआ क्या? सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद केंद्रीय गृह मंत्री ने दो उच्चस्तरीय कमेटियां बनार्इं थीं, इन कमेटियों ने भारतीय दंड संहिता और आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन कर कानून को सख्त बनाने के सुझाव दिए। लेकिन हाल में केंद्र सरकार ने भीड़ हिंसा से निपटने के लिए कोई भी कानून बनाने से यह कहते हुए इनकार कर दिया है कि राज्यों के पास पर्याप्त कानून हैं, वे सख्ती से उन्हें लागू करें। लेकिन सवाल यह है कि केंद्र अपनी जिम्मेदारी से बच कैसे सकता है? यह तो गेंद राज्यों के पाले में डालने जैसा है। ऐसे भीड़ तंत्र की संस्कृति खत्म नहीं होने वाली।

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