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संपादकीय: ईरान का संकट

मौजूदा संकट को दूर करने की दिशा में फ्रांस आगे आया है। उसने ईरान के राष्ट्रपति से बात की है और अगले हफ्ते पश्चिमी देशों का एक प्रतिनिधिमंडल ईरान जाएगा। ईरान संकट का शांतिपूर्ण समाधान जरूरी है।

Author July 10, 2019 12:54 AM
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप।

यूरेनियम संवर्द्धन की सीमा बढ़ाने के ईरान के एलान के बाद अमेरिका की भौंहें और ज्यादा तन गई हैं। चार साल पहले ईरान और अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के बीच जो समझौता हुआ था, वह अब खटाई में पड़ता नजर आ रहा है। अमेरिका ने पिछले साल ही अपने को इस समझौते से अलग कर लिया था। उसके बाद से ही इस पर आशंका के बादल मंडरा रहे हैं। हालांकि समझौता अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है, न ही किसी ने इससे हटने का एलान किया है, लेकिन जिस तरह से इसे दरकिनार कर ईरान को घेरने की रणनीति पर काम हो रहा है और दूसरी ओर ईरान अपने यूरेनियम संवर्द्धन की मात्रा बढ़ा रहा है, उसका स्पष्ट संकेत तो यही है कि इस करार में किसी की भी दिलचस्पी नहीं रह गई है और एक-दूसरे को खुली चुनौती दी जा रही है। ईरान पर शिकंजा कसने के लिए अमेरिका कोई मौका नहीं छोड़ रहा और उसने ईरान को निपटाने के लिए कई तरह से घेरने की रणनीति अपनाई है। आर्थिक प्रतिबंध भी इन्हीं का हिस्सा हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि लंबे समय से कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की मार झेल रहे ईरान की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी है। हालांकि ईरान अब तक यही कहता आया था कि उसने समझौते का पूरा पालन किया है तो क्यों नहीं आर्थिक प्रतिबंधों में ढील मिलनी चाहिए। अमेरिका को छोड़ समझौते से बंधे बाकी यूरोपीय देशों को यह सुनिश्चित करना था कि ईरान पर से आर्थिक प्रतिबंध कम किए जाएं। लेकिन व्यवहार में ऐसा हुआ नहीं और इसी से नाराज ईरान ने भी यूरेनियम संवर्द्धन साढ़े चार फीसद तक बढ़ाने का एलान कर डाला। हालांकि अभी भी इस मात्रा से परमाणु हथियार बनाना कतई संभव नहीं है। ईरान का यह कठोर फैसला 2015 के समझौते- ज्वाइंट कांप्रिहेंसिव प्लान आॅफ एक्शन (जेसीपीओए) के विपरीत है। इस समझौते के तहत ईरान को कुछ ऐसे कदम उठाने थे जो इस बात का प्रमाण होते कि वह परमाणु कार्यक्रम बंद कर चुका है और शांति पूर्ण कार्यों और जरूरतों के लिए ही यूरेनियम संवर्द्धन करेगा, न कि परमाणु हथियार बनाने के लिए। हकीकत तो यह है और दुनिया के ज्यादातर देश इस बात को समझ भी रहे हैं कि ईरान को ऐसे कदम उठाने के लिए उकसाया जा रहा है, ताकि उसे घेरा जा सके। पिछले महीने ही तेल टैंकरों पर हमले और अमेरिकी ड्रोन को मार गिराने का अरोप लगा कर अमेरिका ने ईरान पर हमले की तैयारी कर ली थी। लेकिन ऐन मौके पर उसने अपना फैसला बदल लिया था और युद्ध टल गया।

मौजूदा संकट को दूर करने की दिशा में फ्रांस आगे आया है। उसने ईरान के राष्ट्रपति से बात की है और अगले हफ्ते पश्चिमी देशों का एक प्रतिनिधिमंडल ईरान जाएगा। ईरान संकट का शांतिपूर्ण समाधान जरूरी है। ईरान और अमेरिका के बीच मौजूदा तनाव पूरी दुनिया के लिए खतरा बना हुआ है। ईरान के समर्थन और विरोध में खड़े देशों के बीच लकीर साफ है। रूस, चीन जैसे देश अमेरिकी कार्रवाई का खुल कर विरोध कर रहे हैं। जबकि यूरोपीय देशों में भी ज्यादातर अमेरिकी कार्रवाई से सहमत नहीं हैं। पिछले साल जब अमेरिका ने खुद को समझौते से अलग किया था, तब उसकी आलोचना भी हुई थी। मामला इतना बिगड़ता नहीं अगर सभी देश 2015 के समझौते का ईमानदारी से पालन करते। लेकिन अमेरिका का मकसद शायद कुछ और है! वह किसी न किसी बहाने ईरान पर हमला कर उसके तेल पर कब्जा करना चाहता है। उसकी हठधर्मिता इसी का संकेत है।

 

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