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संपादकीय: संकट और चुनौती

जब किसी एक उद्योग में मंदी का असर दिखता है तो वह इस बात का संकेत होता है कि दूसरे उद्योग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी बिगड़ते आर्थिक हालात पर पहली बार चुप्पी तोड़ते हुए सरकार को आगाह किया है।

अर्थव्यवस्था को लेकर रोजाना जिस तरह से नई-नई खबरें और आंकड़े आ रहे हैं, वे इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि भारत में मंदी का जो माहौल चल रहा है वह मामूली नहीं है। भले सरकार या कुछ अर्थशास्त्री इसे वैश्विक मंदी का असर बता रहे हों या रिजर्व बैंक जैसे वित्तीय संस्थान इसे थोड़े समय का संकट मान कर चल रहे हों, लेकिन उद्योग जगत जिस तरह हांफता नजर आ रहा है, वह अर्थव्यवस्था के लिए कहीं से अच्छा नहीं कहा जा सकता, खासतौर से उस देश के लिए जिसने अगले पांच साल में पांच लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखा है।

ताजा खबर यह आई है कि अगस्त में विनिर्माण क्षेत्र में पिछले पंद्रह महीने की सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई। इस क्षेत्र की वृद्धि दर अब सिर्फ 0.6 फीसद रह गई है। जाहिर है, मांग नहीं निकलने से कारखानों के चक्के ठहरे हुए हैं। बाजार में खरीदार नहीं हैं। इसके पीछे नगदी का संकट एक बड़ा कारण है। देश का वाहन और कलपुर्जा उद्योग तो पिछले दस महीने से मंदी की मार झेल रहा है। भले इसके पीछे जीएसटी या अन्य कारण हों, लेकिन ऑटोमोबाइल उद्योग की इस मंदी ने काफी समय पहले ही चेतने का इशारा कर दिया था। पर सरकार ने वक्त रहते ध्यान नहीं दिया और आज एक नहीं, ज्यादातर उद्योग मंदी की गिरफ्त में हैं।

जब किसी एक उद्योग में मंदी का असर दिखता है तो वह इस बात का संकेत होता है कि दूसरे उद्योग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। अकेले ऑटोमोबाइल उद्योग से सैकड़ों उद्योग जुड़े होते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि त्वरित उपभोग की वस्तुओं यानी एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) क्षेत्र पस्त हो गया है। वस्तुओं की खपत की दर पिछले डेढ़ साल के न्यूनतम स्तर पर आ गई है। इस क्षेत्र में मांग नहीं होने का सीधा-सा मतलब है कि लोगों के पास खरीदारी के लिए पैसे ही नहीं हैं।

मंदी की इस मार में अपने को बचाए रखने के लिए उद्योगों ने सबसे पहला कदम तो कर्मचारियों की छंटनी का उठाया। इससे लाखों लोगों का रोजगार छिन गया। विनिर्माण क्षेत्र का देश के जीडीपी में सबसे ज्यादा हिस्सा होता है। मांग, उत्पादन, खरीद, रोजगार आदि सब एक दूसरे पर ही आधारित होते हैं। ऐसे में अगर कारखाने ठप पड़ने लगेंगे तो संकट का चक्र वहीं से शुरू हो जाएगा। संकट के इस चक्र को ही तोड़ना आज सबसे पहली जरूरत है। पिछले पंद्रह महीनों में पहली बार ऐसा हुआ है जब कारखानों के कच्चे माल की खरीद में गिरावट आई है। कारखानों की ये दशा आने वाले बुरे दिनों का संकेत है।

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी बिगड़ते आर्थिक हालात पर पहली बार चुप्पी तोड़ते हुए सरकार को आगाह किया है। एक अर्थशास्त्री, वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक के गवर्नर रह चुके पूर्व प्रधानमंत्री की चिंताएं वाकई गंभीर संकट की ओर इशारा कर रही हैं। हालांकि पिछले दिनों अर्थव्यवस्था को संकट से निकालने के लिए वित्त मंत्री ने एक के बाद एक कई उपायों का एलान किया है।

लेकिन बड़ी समस्या यह है कि आर्थिकी की डांवाडोल स्थिति से निवेशकों से लेकर जनता तक के भीतर एक तरह का खौफ और अविश्वास पैदा हो गया है। लोग खर्च के लिए पैसा निकालने से बच रहे हैं। पता नहीं कब किस संकट का सामना करना पड़ जाए। यही वजह है कि बाजार में पैसे का प्रवाह नहीं बन पा रहा है और नगदी का संकट है। जब तक यह चक्र टूटेगा नहीं तब तक अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला पाना संभव नहीं है। इसके लिए जरूरी है सरकार आर्थिक उपायों के साथ-साथ लोगों में भरोसा भी पैदा करे।

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