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संपादकीय: इलाज की कीमत

बहुत सारे गांव ऐसे हैं, जहां सरकारी डॉक्टरों की नियुक्ति तो हुई है, लेकिन वे वहां ड्यूटी करने के बजाय शहरों में अपना निजी क्लीनिक चलाने में विश्वास करते हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

किसी भी देश में विकास के असली पैमाने इससे आंके जाने चाहिए कि वहां सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और शिक्षा की व्यवस्था कैसी है और वह कितने लोगों की पहुंच में है। लेकिन हमारे देश में चिकित्सा और पढ़ाई-लिखाई की समूची व्यवस्था जैसे-जैसे सरकारी तंत्र से फिसल कर निजी हाथों में जा रही है, वैसे-वैसे एक बड़ी आबादी उसके दायरे से बाहर होती जा रही है। विडंबना यह है कि किसी बीमारी के इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों के मुकाबले निजी अस्पतालों में कई गुना ज्यादा रकम चुकानी पड़ती है। इसके बावजूद लोगों के सामने विकल्प सिमटते जा रहे हैं। या तो वे इलाज के नाम पर कई गुना ज्यादा पैसे चुकाने पर मजबूर हैं या फिर बेहतर चिकित्सा से वंचित रह जाते हैं। हालांकि अनेक अध्ययनों में इलाज के महंगे होने के तथ्य सामने आते रहे हैं, लेकिन अब खुद राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी एनएसओ की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट में यह बताया गया है कि देश के निजी क्षेत्र के अस्पतालों में लोगों को इलाज कराने के लिए सरकारी अस्पतालों की तुलना में सात गुना ज्यादा अधिक धन खर्च करना पड़ता है।

अगर खुद सरकार के किसी महकमे की रिपोर्ट में यह स्वीकार किया जा रहा है तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि इलाज में खर्च का इतना बड़ा फर्क सरकार की नजर में है, लेकिन इसे संतुलित करना करना सरकार को जरूरी नहीं लगता। गौरतलब है कि गर्भवती महिला के प्रसव पर एक सरकारी अस्पताल में कुल खर्च जहां ढाई हजार रुपए से भी कम आता है, वहीं किसी निजी अस्पताल या क्लीनिक में इसी मद में करीब इक्कीस हजार रुपए खर्च करने पड़ते हैं।

ऐसी खबरें आम रही हैं कि अच्छी चिकित्सा के नाम पर निजी अस्पतालों में किस तरह मनमाने तरीके से पैसे वसूले जाते हैं और कई बार जरूरत नहीं होने पर भी इलाज को जटिल बना कर पेश किया जाता है। अगर प्रसव को उदाहरण मानें तो सरकारी अस्पतालों में जहां महज सत्रह फीसद मामलों में आॅपरेशन किया गया, वहीं निजी अस्पतालों में यह आंकड़ा पचपन फीसद है। इसके अलावा, सरकारी अस्पतालों में ऐसे आॅपरेशन या तो मुफ्त किए जाते हैं या फिर किसी परिवार को बहुत कम खर्च करना पड़ता है। दूसरी ओर, निजी अस्पतालों में आने वाले खर्च के बारे में शायद अलग से बताने की जरूरत नहीं है।

दरअसल, समस्या यह है कि पिछले करीब डेढ़-दो दशक के दौरान दूसरे कई क्षेत्रों की तरह स्वास्थ्य विभाग और चिकित्सा प्रणाली में सरकारी ढांचा लगातार कमजोर हुआ है और इसके बरक्स इतनी ही तेजी से इस मामले में निजी क्षेत्र का विस्तार हुआ है। देश में सार्वजनिक चिकित्सा प्रणाली में आज भी डॉक्टरों की भारी कमी है। दूरदराज और ग्रामीण इलाकों की तो दूर, कई शहरों तक के सरकारी अस्पतालों में व्यवस्था और चिकित्सा सुविधा की गुणवत्ता ऐसी नहीं है कि लोग बिना किसी हिचक के सबसे पहले वहीं जाएं।

बहुत सारे गांव ऐसे हैं, जहां सरकारी डॉक्टरों की नियुक्ति तो हुई है, लेकिन वे वहां ड्यूटी करने के बजाय शहरों में अपना निजी क्लीनिक चलाने में विश्वास करते हैं। बदहाल व्यवस्था और प्रबंधन ने सरकारी अस्पतालों में बेहतर इलाज की विश्वसनीयता को कमजोर किया है। ऐसे में निजी क्षेत्र के अस्पताल अच्छी चिकित्सा का दावा करते हैं और कई बार लोगों के सामने इसके अलावा कोई विकल्प नहीं होता। कायदे से सरकार को सार्वजनिक स्वास्थ्य का समूचा ढांचा इतना मजबूत करना चाहिए कि लोगों को निजी अस्पतालों का रुख न करना पड़े। अच्छी और गुणवत्ता से लैस चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है, जिस तक समाज के सभी तबकों की पहुंच हो और उसके लिए नाहक ही लोगों को बेलगाम खर्च न करना पड़े।

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