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संपादकीय: आशंका के सामने

इस मामले में असम का उदाहरण सामने है, जहां अनिवार्य घोषित किए गए दस्तावेजों के अभाव में करीब उन्नीस लाख लोग एनआरसी से बाहर रह गए। यानी उनकी नागरिकता कठघरे में है।

नागरिकता कानून के खिलाफ दिल्ली में पथराव (फोटो सोर्स- एएनआई)

हाल ही में नागरिकता संशोधन विधेयक के संसद में पारित हो जाने के बाद उठा विवाद अब जिस तरह देश भर में फैल गया लगता है, उससे साफ है कि इस मसले से निपटने में सरकार के स्तर पर शायद जल्दबाजी की गई। यों भी, आजादी के बाद से भारत जिस परंपरा का वाहक रहा है, उसमें सरकार के किसी फैसले से असहमति और उस पर होने वाले विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र की खूबसूरती रहे हैं। मगर नागरिकता संबंधी बने नए कानून को लेकर लोगों के बीच जो आशंकाएं उभरीं, उसका समाधान निकालने के बजाय उसकी अनदेखी की गई। खासतौर पर दिल्ली में जामिया मिल्लिया के विद्यार्थियों के प्रदर्शन के बाद परिसर में घुस कर पुलिस ने जैसा बर्बर रवैया अख्तियार किया था, उस पर गंभीर सवाल उठे। सही है कि उस प्रदर्शन के दौरान हिंसा करने वाले तत्त्वों से निपटना पुलिस की जिम्मेदारी थी, लेकिन विश्वविद्यालय के पुस्तकालय और हॉस्टल तक में जाकर विद्यार्थियों के साथ जिस तरह मारपीट की गई, उसका औचित्य साबित करना संभव नहीं है। इसका नतीजा यह हुआ कि विवाद के जो केंद्र पहले कुछ विश्वविद्यालयों के परिसर तक सीमित थे, वे देश के बड़े हिस्से में फैल गए। हालत यह हुई कि गुरुवार को इस मुद्दे पर कई नागरिक समूहों की ओर से देश भर में व्यापक विरोध प्रदर्शन सामने आए।

असम और पूर्वोत्तर के राज्यों में इस मुद्दे पर उठा तूफान पहले ही सरकार के लिए एक बड़ी समस्या बनी हुई है। सरकार की ओर से तमाम आश्वासनों के बावजूद वहां के लोगों का विरोध नहीं थम रहा है। बल्कि देश के दूसरे राज्यों में भी लोग सड़कों पर उतर आए। अब जब हालात गंभीर होने लगे तब गृहमंत्री ने ताजा हालात पर विचार के लिए बैठक बुलाई, लेकिन क्या यह जरूरी नहीं था कि पिछले कुछ दिनों से देश में जैसी स्थिति बन रही थी, उसके मद्देनजर समय पर कदम उठाए जाते! कायदे से यह विषय जितने महत्त्व का है, उसमें इसके व्यापक असर के मद्देनजर हर पहलू पर गौर करके इस पर आने वाली आपत्तियां और संशोधनों पर विचार किया जाना चाहिए था। इसका फायदा यह होता कि आज अलग-अलग नागरिक समूह और राजनीतिक दल धर्म आधारित नागरिकता की व्यवस्था पर जैसे सवाल उठा रहे हैं और लोगों के बीच जैसी आशंकाएं खड़ी हो गई हैं, उसे दूर करने में मदद मिलती।

विडंबना यह है कि इस पर किसी भी तरह के विरोध या सवाल को स्वीकार करना जरूरी नहीं समझा गया। बल्कि सरकार की जिद का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि न केवल संशोधनों और आशंकाओं को कोई तरजीह नहीं दिया गया, बल्कि इस बात की भी घोषणा होती रही कि नागरिता संशोधन कानून को लागू करने के लिए देश भर में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी की व्यवस्था लागू होगी। इस मामले में असम का उदाहरण सामने है, जहां अनिवार्य घोषित किए गए दस्तावेजों के अभाव में करीब उन्नीस लाख लोग एनआरसी से बाहर रह गए। यानी उनकी नागरिकता कठघरे में है। इसके अलावा, काम के पूरा होने की प्रक्रिया में एक लंबा वक्त और भारी राशि खर्च हुई। सवाल है कि अगर देश भर में एनआरसी की प्रक्रिया शुरू की गई तो उसका प्रारूप क्या होगा? चिंता या आशंका की मुख्य वजह यही है कि नागरिकता संशोधन कानून लागू होने के बाद अगर एनआरसी तैयार करने की प्रक्रिया शुरू होती है तो एक बड़ी जटिलता खड़ी हो सकती है। जरूरत इस बात की है कि इस मसले पर सरकार लोगों की बात सुने और उनकी आशंकाओं का निराकरण करे।

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