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दुरंगी चाल

भारतीय वायु सेना के पाकिस्तान की सीमा में चल रहे आतंकी शिविरों पर लक्षित हमले के बाद पाकिस्तानी हुकूमत ने जिस तरह जंग को किसी के भी हित में न बताते हुए अमन का पैगाम देने की कोशिश की थी और बातचीत का सिलसिला शुरू करने की बात कही थी, उससे लगा था कि वह अब दोनों देशों के रिश्तों में तनाव खत्म करने को लेकर गंभीर है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान (AP/PTI)

भारतीय वायु सेना के पाकिस्तान की सीमा में चल रहे आतंकी शिविरों पर लक्षित हमले के बाद पाकिस्तानी हुकूमत ने जिस तरह जंग को किसी के भी हित में न बताते हुए अमन का पैगाम देने की कोशिश की थी और बातचीत का सिलसिला शुरू करने की बात कही थी, उससे लगा था कि वह अब दोनों देशों के रिश्तों में तनाव खत्म करने को लेकर गंभीर है। पर हकीकत यह है कि वह कहता कुछ तथा करता कुछ और है। इसका ताजा उदाहरण फिर से संघर्ष विराम का उल्लंघन करते हुए सीमारेखा पर रजौरी जिले के नौशेरा सेक्टर में पाकिस्तानी सेना की तरफ से की गई गोलीबारी है। इस गोलीबारी में सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले चार भारतीय नागरिक मारे गए। सेना ने जवाबी हमला किया, जिसमें पाकिस्तान के भी चार नागरिक और दो रेंजर मारे गए। इसके पहले भी पुंछ की कृष्णा घाटी में पाकिस्तानी गोलीबारी से एक युवती और दो बच्चों की मौत हो गई थी। पिछले एक साल में पाकिस्तान सैकड़ों बार संघर्ष विराम का उल्लंघन कर चुका है। अगर वह सचमुच अमन चाहता, तो इस तरह संघर्ष विराम का उल्लंघन न करता।

वायुसेना के हमले के बाद जिस तरह दुनिया भर में पाकिस्तान की निंदा हुई, उससे भी शायद उसने कोई सबक नहीं सीखा है। वहां के प्रधानमंत्री इमरान खान ने वायुसेना हमले के बाद वीडियो संदेश देकर अमन की बात की थी, फिर अगले ही दिन उनके युद्धक विमान भारतीय सीमा में घुसे, जिसमें से एक को मार गिराया गया। तब फिर इमरान खान ने अपनी संसद में भारत को अमन की सीख दी और बातचीत की पेशकश करते हुए दुनिया के सामने अपना मानवीय चेहरा पेश करने का प्रयास किया। पर वह चेहरा उस वक्त बेनकाब हो गया जब भारत को इस्लामिक देशों के संगठन आइओसी के सम्मेलन में शामिल होने का न्योता मिलने पर पाकिस्तान ने उसका बहिष्कार कर दिया। अगर वह सचमुच भारत के साथ मसले सुलझाने को लेकर गंभीर होता, तो इतनी कटुता उसमें न होती। संघर्ष विराम को लेकर भी वह इतना लापरवाह शायद न होता। इमरान की अमन और तरक्की की बातों से एक बार को तो यही लगा था कि शायद सरकार, सेना और वहां की खुफिया एजंसी के बीच इस मसले को लेकर कोई सहमति बनी होगी। पर संघर्ष विराम उल्लंघन ने एक बार फिर यही साबित किया है कि पाकिस्तानी सेना का रुख बिल्कुल नहीं बदला है।

दरअसल, पाकिस्तान ऐसी दुरंगी चालें सदा से चलता रहा है। यह भी छिपी बात नहीं है कि वह संघर्ष विराम का उल्लंघन क्यों करता है। वह गोलीबारी करके भारतीय सैनिकों का ध्यान भटकाने का प्रयास करता है और फिर उसकी आड़ में चरमपंथियों को सीमा पार करने का प्रयास करता है। यह भी अकारण नहीं है कि जिस समय पाकिस्तानी सेना नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी कर रही थी, उसी समय हंदवाड़ा में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में पांच भारतीय जवान शहीद हो गए। सब जानते हैं कि पाकिस्तानी सेना चरमपंथियों को पोसती और फिर उन्हें भारत के खिलाफ इस्तेमाल करती है। इसलिए जब भी आतंकवाद पर रोक लगाने की बात होती है, पाकिस्तानी हुक्मरान पहले कश्मीर मसले के हल की बात उठा कर बात का रुख मोड़ देते हैं। पाकिस्तान के ऐसे दोहरे रवैये से भला कहां तक अमन और बातचीत के जरिए मसलों को हल करने की उम्मीद की जा सकती है।

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