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संपादकीय: दावेदारी और अवरोध

जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मौलाना मसूद अजहर पर पाबंदी लगाने का मामला सिर्फ चीन के वीटो की वजह से सिरे नहीं चढ़ पा रहा था। इसलिए अगर सुरक्षा परिषद का विस्तार होता है तो इसके फैसले ज्यादा तर्कसंगत हो सकेंगे।

Author May 9, 2019 1:11 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (Express Photo by Dasarath Deka)

भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने के लिए फ्रांस ने पुरजोर तरीके से समर्थन किया है। भारत को फ्रांस का यह समर्थन इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण माना जाना चाहिए कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी का समर्थन तो तमाम देश करते रहे हैं, लेकिन उसे ‘बेहद जरूरी’ किसी ने नहीं बताया। हाल में संयुक्त राष्ट्र में फ्रांस के स्थायी प्रतिनिधि फ्रैंकॉइस डेलातरे ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाना ‘बेहद जरूरी’ है। फ्रांस के इस समर्थन ने वैश्विक राजनीति में भारत के महत्त्व को तो रेखांकित किया ही है, साथ ही सुरक्षा परिषद के विस्तार की जरूरत भी साफ कर दी है। इससे यह भी पता चलता है कि अब दुनिया के विकसित राष्ट्रों में भारत की अहमियत को स्वीकार किया जा रहा है और सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य भी कहीं न कहीं यह महसूस कर रहे हैं कि परिषद का विस्तार कर भारत को स्थायी सदस्य बनाया जाना चाहिए। फ्रांस खुद सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है और अब इस वैश्विक संस्था में सुधार के लिए आवाज उठा रहा है लेकिन कुछ राष्ट्र अपने हितों की वजह से इसे होने नहीं देना चाहते।

यों संयुक्त राष्ट्र में सुधार को लेकर लंबे समय से मांग चल रही है। दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद बनी इस वैश्विक संस्था की स्थापना के समय से ही इस पर महाबलियों का कब्जा रहा है। वीटो की शक्ति से संपन्न ये राष्ट्र आज भी जिस तरह दुनिया को हांक रहे हैं, वह हैरान करने वाला है। इससे कुल मिला कर स्थिति यह बनी हुई है कि ज्यादातर राष्ट्रों के लिए यह संस्था एक मुखौटे से ज्यादा साबित नहीं हो रही। अंतरराष्ट्रीय महत्त्व के मसलों पर जब भी कोई अंतिम निर्णय की बात आती है तो पांच देशों का ही मत उसमें काम करता है। इस वक्त अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं। अगर किसी भी मामले में इनमें से एक भी सदस्य वीटो के अधिकार का उपयोग कर लेता है तो वह मसला निर्णायक बिंदु पर नहीं पहुंच पाता। जैसे जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मौलाना मसूद अजहर पर पाबंदी लगाने का मामला सिर्फ चीन के वीटो की वजह से सिरे नहीं चढ़ पा रहा था। इसलिए अगर सुरक्षा परिषद का विस्तार होता है तो इसके फैसले ज्यादा तर्कसंगत हो सकेंगे। फ्रांस ने वक्त की नजाकत को भांपते हुए भारत के साथ ही जर्मनी, ब्राजील और जापान को भी स्थायी परिषद में जगह देने की वकालत की है। इसके अलावा, अफ्रीकी देशों में से भी सुरक्षा परिषद की नुमाइंदगी जरूरी समझी जा रही है। फ्रांस को आज यह बेहद जरूरी इसलिए भी लग रहा है कि वह अमेरिकी दबदबे के दूरगामी प्रभावों को समझ रहा है।

हालांकि सुरक्षा परिषद में किसी भी तरह का विस्तार बिना चार्टर में संशोधन किए नहीं हो सकता और चार्टर में संशोधन के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा में दो-तिहाई सदस्य देशों का समर्थन जरूरी है। इसके अलावा इस संशोधन को बाद में पांचों स्थायी सदस्य देशों के दो तिहाई सदस्य देशों की हरी झंडी भी चाहिए। लेकिन भारत के लिए यह आसान इसलिए नहीं है कि चीन इसका विरोध करेगा, यह किसी से छिपा नहीं है। स्थायी सदस्यता के मसले पर द्विपक्षीय वार्ताओं में तो रूस भारत की उम्मीदवारी का समर्थन करता है, लेकिन बहुपक्षीय स्तर पर विस्तार की प्रक्रिया का विरोध करता है। यह भारत के लिए बड़ा अवरोध है। ऐसे में भारत के लिए स्थायी सदस्यता की राह असान नहीं लगती।

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