ताज़ा खबर
 

संपादकीय: टीबी से निपटने की चुनौती

स्वास्थ्य सेवाओं के इन बदतर हालात के लिए सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर सजगता और गंभीरता का हमारे नीति-निर्माताओं में घोर अभाव है। पिछले दो दशकों में यह देखने में आया है कि सरकारों ने विभिन्न रोगों की रोकथाम और कल्याणकारी परियोजनाओं के मद में धन की कटौती की है।

टीबी केवल महिलाओं में बांझपन का कारण ही नहीं बनती, पुरुष भी इससे बुरी तरह प्रभावित होते हैं।

यह चिंताजनक है कि देश में टीबी उन्मूलन अभियान के बीच पिछले एक साल में टीबी के साढ़े इक्कीस लाख नए मरीजों की पहचान हुई है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि इन मरीजों में बीस फीसद मरीज देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में हैं। उत्तर प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र में दस फीसद, राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात में सात-सात फीसद और तमिलनाडु, बिहार और पश्चिम बंगाल में पांच-पांच फीसद पाए गए हैं। गौर करें तो इन मरीजों में नवासी फीसद की आयु पंद्रह से उनहत्तर वर्ष के बीच है। इनमें महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों की संख्या सबसे ज्यादा है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत से टीबी के खात्मे की समयसीमा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की समयसीमा वर्ष 2030 से पांच साल पहले यानी 2025 तक की तय की। लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए यह कह पाना मुश्किल है कि 2025 तक इस लक्ष्य को साधा जा सकेगा। ऐसा इसलिए है कि भारत दुनिया में टीबी के मरीजों का सबसे बड़ा केंद्र बनता जा रहा है।

टीबी मरीजों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है। अगर इस साल के आंकड़ों को शामिल कर लिया जाए तो भारत में टीबी मरीजों की तादाद पैंतीस लाख से ऊपर पहुंच चुकी है। गौर करने लायक बात यह है कि एक ओर भारत ने 2025 तक टीबी पर नियंत्रण पाने का लक्ष्य सुनिश्चित किया है और इसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन मदद कर रहा है, वहीं दूसरी ओर टीबी के मरीजों की बढ़ती संख्या यह रेखांकित करती है कि टीबी से निपटने की चुनौती जस की तस बनी हुई है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट से इतर विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े भी यही बता रहे हैं कि भारत में टीबी के मरीजों की संख्या हर साल बढ़ रही है और साथ ही इस रोग से मरने वालों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है। 2015 में भारत में टीबी के अट्ठाईस लाख मामले आए थे और उस साल इस बीमारी से करीब पांच लाख लोगों की मौत हुई थी। समस्या यह है कि भारत में टीबी के ज्यादातर मामले तो दर्ज भी नहीं होते हैं। दर्ज नहीं होने वाले मामलों में विश्व में हर चौथा मामला भारत का होता है। वर्ष 2013 में दुनिया के दस देशों में तकरीबन चौबीस लाख टीबी के मामले दर्ज ही नहीं हुए थे, जिनमें सर्वाधिक संख्या भारतीयों की थी।

दरअसल, भारत में टीबी रोग में वृद्धि का मूल कारण जागरूकता की कमी और उचित इलाज का अभाव है। उसी का नतीजा है कि भारत में टीबी के मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। टीबी माइक्रोबैक्टीरियम टुबरक्लोरसिस नामक जीवाणु के कारण होती है। भारत में हर वर्ष तीन लाख से अधिक लोगों को टीबी के कारण मौत के मुंह में जाना पड़ता है। टीबी का फैलाव इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति द्वारा लिए जाने वाले श्वास-प्रश्वास के द्वारा होता है। केवल एक रोगी पूरे वर्ष के दौरान दस से भी अधिक लोगों को संक्रमित कर सकता है। यह बीमारी प्रमुख रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है। लेकिन, अगर इसका समय रहते उपचार न कराया जाए तो यह रक्त के द्वारा शरीर के दूसरे भागों में भी फैल कर उन्हें संक्रमित करती है।

ऐसे संक्रमण को द्वितीय संक्रमण कहा जाता है। यह संक्रमण किडनी, डिंब वाही नलियों, गर्भाशय और मस्तिष्क को प्रभावित कर सकता है। टीबी महिलाओं के लिए गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। टीबी केवल महिलाओं में बांझपन का कारण ही नहीं बनती, पुरुष भी इससे बुरी तरह प्रभावित होते हैं। महत्त्वपूर्ण तथ्य यह कि इसके लक्षण तत्काल दिखाई नहीं देते हैं और लक्षण दिखाई देने तक ये प्रजनन क्षमता को पहले ही नुकसान पहुंचा चुके होते हैं। आंकड़े बताते हैं कि टीबी से पीड़ित हर दस महिलाओं में से दो गर्भधारण नहीं कर पाती हैं। अधिकतर वही लोग इसकी चपेट में आते हैं जिनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है और जो संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आते हैं। जब संक्रमित व्यक्ति खांसता या छींकता है तब बैक्टीरिया वायु में फैल जाते हैं और जब हम सांस लेते हैं तो ये हमारे फेफड़ों में पहुंच जाते हैं।

महिलाओं के साथ बच्चों के लिए भी टीबी एक बहुत बड़ा खतरा है। बच्चों के कुछ समूह अन्य लोगों की तुलना में टीबी के दायरे में ज्यादा होते हैं। ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि टीबी की जद में आने वाले बच्चों के लिए तत्काल इलाज की व्यवस्था की जाए। बीसीजी का टीका बच्चों में टीबी के उपचार में काफी हद तक कारगर साबित हो रहा है। आमतौर पर टीबी के साधारण लक्षण होते हैं जिनकी आसानी से पहचान की जा सकती है। तीन सप्ताह से अधिक समय से खांसी या थूक के साथ खून आए तो सतर्क हो जाना चाहिए। टीबी की जद में आने वाले व्यक्ति को अक्सर रात में बुखार आता है और धीरे-धीरे उसका वजन कम होता जाता है। भूख भी नहीं लगती है और शरीर कमजोर होता चला जाता है। अगर ऐसा कुछ लक्षण दिखे तो तत्काल डॉक्टर से परामर्श लेकर उचित इलाज होना चाहिए।

यह विडंबना है कि भारत में टीबी के नियंत्रण के लिए कई योजनाएं चल रही हैं, लेकिन इस जानलेवा बीमारी ने एड्स को भी पीछे छोड़ दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि गरीबी, कुपोषण, सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और दवाओं की कमी और सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं के लिए धन की कमी इस जानलेवा बीमारी पर नियंत्रण लगाने की राह में सबसे बड़ी बाधा बन रही है। नतीजतन, टीबी के खिलाफ लड़ाई कमजोर पड़ रही है। भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की दशा कितनी दयनीय है, यह किसी से छिपा नहीं है। कस्बों और शहरों में तो अस्पताल, नर्सिंग होम, डॉक्टर और दवा उपलब्ध हैं, लेकिन गांवों की हालत बेहद खस्ता है। यहां न तो डॉक्टर हैं और न ही अस्पताल। भला ऐसे में टीबी पीड़ित मरीजों का इलाज कैसे होगा, यह गंभीर सवाल है।
स्वास्थ्य सेवाओं के इन बदतर हालात के लिए सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं।

स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर सजगता और गंभीरता का हमारे नीति-निर्माताओं में घोर अभाव है। पिछले दो दशकों में यह देखने में आया है कि सरकारों ने विभिन्न रोगों की रोकथाम और कल्याणकारी परियोजनाओं के मद में धन की कटौती की है। आंकड़ों पर गौर करें तो केंद्र सरकार ने वर्ष 2012 से 2015 के दौरान टीबी पर नियंत्रण लगाने से संबंधित परियोजनाओं के लिए सिर्फ 24.30 करोड़ डॉलर की रकम जारी की थी, जबकि संबंधित संस्थाओं ने इन योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए कम से कम तियालीस करोड़ डॉलर की मांग की थी।

अगले दो वर्षों का भी हाल कमोबेश ऐसा ही रहा। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टियां चुनाव अभियान में जितनी रकम खर्च कर देती हैं, अगर उसका एक हिस्सा भी टीबी पर नियंत्रण की योजनाओं में लगाया जाए तो टीबी के विरुद्ध जंग को फतह किया जा सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो सरकार को दूसरे गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करके सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित परियोजनाओं को पर्याप्त धन मुहैया कराना चाहिए। इसलिए और भी कि धन की कमी की वजह से टीबी से आधी-अधूरी लड़ाई लड़ी जा रही है, जो बेहद खतरनाक है और इसका खमियाजा देश की भावी पीढ़ी को भुगतना पड़ रहा है। उचित होगा कि भारत सरकार टीबी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए ठोस योजना तैयार करे और विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित अन्य निजी संगठनों की मदद ले।

Next Stories
1 संपादकीय: कार्रवाई और संदेश
2 संपादकीय: महासभा के सामने प्रधानमंत्री
3 संपादकीय: दोहरेपन की हद
ये पढ़ा क्या?
X