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संपादकीय: बुजुर्गों की फिक्र

हाल ही में बिहार सरकार ने एक अहम फैसला लिया है कि माता-पिता की सेवा नहीं करने और उन पर अत्याचार करने वाली संतानों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी और उन्हें जेल भेजा जाएगा।

Author July 4, 2019 1:06 AM
हाल ही में बिहार सरकार ने एक अहम फैसला लिया है।

इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जिन माता-पिता ने कितने कष्ट उठा कर और कितने सपने पाल कर बच्चों को जन्म दिया होता है, कई बार उन्हें उनसे ही उपेक्षा और दुख मिलता है। इसमें कोई शक नहीं है कि इस तरह के दुख किसी भी माता-पिता को दुनिया के दूसरे तमाम दुखों से ज्यादा गहरा दर्द देते हैं। लेकिन कभी उम्र और वक्त की मार तो कभी भावनाओं के बंधन से उपजी लाचारियों की वजह से उम्रदराज लोगों के सामने अपने दुख को अपने ही भीतर दबा लेने के सिवाय और विकल्प नहीं होता। यह जटिल स्थिति तब और बढ़ जाती है जब उन्हें अपने हक में मौजूद कानूनी प्रावधानों की जानकारी नहीं होती या उनके प्रति वे जागरूक नहीं होते। अब केंद्र सरकार ने अपने बुजुर्ग माता-पिता का खयाल नहीं रखने, उनका परित्याग करने या उनसे दुर्व्यवहार करने वालों के लिए बने कानूनों को और सख्त करने का प्रस्ताव किया है। इसके तहत अगर कोई व्यक्ति अपने बुजुर्ग माता-पिता को उनके हाल पर छोड़ देता है या उनके साथ बेरहमी करता है तो उसे अब छह महीने तक की जेल की सजा हो सकती है। कानून में एक अहम बदलाव यह है कि इसमें अब तक जहां माता-पिता की सिर्फ अपनी संतान और नाती-पोते आते हैं, वहीं अब दत्तक संतान या सौतेले बच्चे, दामाद और बहू आदि को भी इस दायरे में माना जाएगा।

किसी भी देश या राज्य की यह जिम्मेदारी है कि वह जीवन चक्र की सहज प्रक्रिया की वजह से बुजुर्गों को न सिर्फ उम्र की वजह से उपजी असुविधाओं के मद्देनजर, बल्कि एक नागरिक के तौर पर भी जरूरी मदद मुहैया कराए, इसके लिए बाकायदा कानूनी प्रावधान करे। इसमें एक जरूरी व्यवस्था यह करने की जरूरत है कि परिवार और समाज में उपेक्षा की मार झेलने वाले तमाम बुजुर्गों के बच्चों की जिम्मेदारी तय की जाए। अगर वे अपनी जिम्मेदारी से भागते हैं तो इसे अपराध घोषित किया जाए। यों बुजुर्गों के दुख को कम करने के लिए राजनीतिक हलकों में समय-समय पर मांग उठती रही है और पहले भी कुछ कानूनी प्रावधान किए गए हैं। मसलन, परिवार के बीच वृद्धावस्था में पहुंच चुके लोगों की उपेक्षा और यहां तक कि मारपीट और घर से निकाल दिए जाने जैसी घटनाओं में बढ़ोतरी के मद्देनजर ही 2007 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण व कल्याण कानून’ बनाया था। लेकिन समाज में बुजुर्गों के बीच जागरूकता की कमी की वजह से इसके असर का दायरा सीमित रहा।

हाल ही में बिहार सरकार ने एक अहम फैसला लिया है कि माता-पिता की सेवा नहीं करने और उन पर अत्याचार करने वाली संतानों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी और उन्हें जेल भेजा जाएगा। अब अगर बुजुर्ग माता-पिता का खयाल रखने के मकसद से केंद्र सरकार ने भी इस मसले पर पहले के कानूनी प्रावधानों को और सख्त करने का फैसला लिया है तो निश्चित रूप से यह स्वागतयोग्य है। लेकिन इसके सकारात्मक नतीजे इस बात पर निर्भर रहेंगे कि इस कानून को लेकर समाज कितना जागरूक हो पाता है और वृद्धावस्था में पहुंचे लोगों को अपने अधिकारों के बारे में कितनी जानकारी हो पाती है। हालांकि यह अपने आप में एक दुखद बात है कि बुजुर्ग अवस्था में पहुंच चुके माता-पिता की सुरक्षा और संरक्षण तय करने के लिए किसी कानून का सहारा लेना पड़े, लेकिन जब एक सामाजिक और स्वाभाविक जिम्मेदारी के तहत उनकी संतान ऐसा नहीं करती हैं तो उन्हें कानूनन इसके लिए बाध्य करने के सिवा कोई विकल्प नहीं होता है।

 

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