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संपादकीय: कैंसर के पांव

विकसित देशों में कैंसर से पीड़ित अस्सी फीसद बच्चे इस रोग के इलाज के दौरान ठीक हो जाते हैं, जबकि भारत में डॉक्टर कैंसर से पीड़ित केवल तीस फीसद बच्चे ही बचा पाते हैं।

Author Published on: September 17, 2019 1:05 AM
सांकेतिक तस्वीर।

एक समय था जब कैंसर से पीड़ित मरीजों के मामले कभी-कभार ही सुनने में आते थे और यह लोगों के चौंकने का मामला होता था। लेकिन आज अक्सर लोगों को उनके संपर्क के किसी व्यक्ति के कैंसर से पीड़ित होने और कई बार उनकी मौत तक की खबरें सुननी पड़ती हैं। जाहिर है, कैंसर के इस तरह पांव फैलाने के पीछे एक बड़ी वजह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में खानपान से लेकर समूची जीवनशैली में आए बदलाव हैं। लेकिन इस समूचे मसले पर सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि अब यह जानलेवा रोग बहुत तेजी से बच्चों को भी अपनी चपेट में ले रहा है। एक खबर के मुताबिक दुनिया भर में हर साल लगभग तीन लाख बच्चे इस बीमारी के शिकार हो जाते हैं। इनमें से अठहत्तर हजार यानी करीब एक चौथाई से ज्यादा बच्चों की मौत अकेले भारत में हो जाती है। यह आंकड़ा किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को दहला देने के लिए काफी है, क्योंकि इतनी बड़ी तादाद में बच्चों का कैंसर की चपेट में आना एक बड़ी चेतावनी है कि आने वाली पीढ़ियों पर कैंसर की भयावह मार पड़ सकती है।

यह किसी से छिपा नहीं है कि यह रोग खानपान और जीवनशैली की वजह से उभरता है और आमतौर पर रोग-प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने की वजह से ही किसी व्यक्ति के शरीर में घर बनाता है। तो क्या हमारे समाज में लोग अपने बच्चों के जीवन को इस जोखिम में छोड़ रहे हैं जिसमें वे इस रोग से बचाव के प्रति लापरवाही बरतें? निश्चित रूप से कैंसर के लिए वंशानुगत या अनुवांशिक कारण भी जिम्मेदार होते हैं, लेकिन इसके अलावा रोजमर्रा की जिंदगी में जिस तरह की खाने-पीने चीजें बच्चों की आदत में शुमार होती गई हैं, वे उनके शरीर के पोषण की स्थिति को कमजोर करती हैं और उनके भीतर रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।

ऐसे में बहुत ज्यादा संरक्षण में रहने वाला कोई भी बच्चा आसानी से किसी बीमारी और यहां तक कि कुछ स्थितियों में कैंसर जैसे घातक रोग की चपेट में आ जाता है। अफसोस की बात यह है कि मौजूदा समय तक भी इसका कोई कारगर और सुलभ इलाज नहीं ढूंढ़ा जा सका है। फिर भी, अगर शुरुआती दौर में कैंसर का पता चल जाता है तो ज्यादातर मामलों में उससे निजात पाई जा सकती है।

दरअसल, हमारे यहां आज भी स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा इस कदर कमजोर है कि कैंसर के अलावा भी बहुत सारी बीमारियां समय पर पहचान में नहीं आ पातीं और समय पर इलाज नहीं मिलने की वजह से किसी व्यक्ति की नाहक ही जान चली जाती है। अगर कोई व्यक्ति निजी अस्पतालों का रुख करता भी है तो वहां का महंगा इलाज उसे लाचार बना देता है। खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में कैंसर पीड़ित बच्चों के अस्पताल और आधुनिक चिकित्सा सेवाओं तक पहुंचने की दर केवल पंद्रह फीसद है।

दूसरी ओर, विकसित देशों में कैंसर से पीड़ित अस्सी फीसद बच्चे इस रोग के इलाज के दौरान ठीक हो जाते हैं, जबकि भारत में डॉक्टर कैंसर से पीड़ित केवल तीस फीसद बच्चे ही बचा पाते हैं। जाहिर है, परिवारों में बच्चों के खानपान, जीवनशैली में सुधार के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं में कमी के समांतर गरीबी और जागरूकता के अभाव को दूर किए बिना इस रोक की मारक क्षमता से लड़ पाना मुश्किल बना रहेगा। सवाल है कि जब कमजोर स्वास्थ्य सेवाओं की वजह से इस रोग की समय पर पहचान कर पाना ही मुश्किल बना हुआ है, तब उसके इलाज को लेकर कितना आश्वस्त हुआ जा सकता है!

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