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संपादकीय: कारोबारी जंग

चीन और अमेरिका भले अपने कारणों से लड़ रहे हों, लेकिन इस जंग से भारत अछूता नहीं रहने वाला। व्यापार युद्ध से उठने वाली आंच भारत को भी झेलनी पड़ सकती है। अगर दोनों पक्षों के बीच जल्द ही कोई पटरी नहीं बैठी तो अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ सकती हैं।

Author May 14, 2019 1:58 AM
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (REUTERS/Aaron P. Bernstein)

चीन और अमेरिका के बीच इन दिनों जो व्यापार युद्ध भड़का हुआ है, उसे सिर्फ दो देशों के बीच कारोबारी लड़ाई या होड़ मान कर खारिज नहीं किया जा सकता। हालात बता रहे हैं कि मामला जल्द नहीं सुलझने वाला, क्योंकि दोनों देशों ने इसे अब नाक का सवाल बना लिया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण इसलिए है कि उन्हें फिर से राष्ट्रपति का चुनाव लड़ना है। ऐसे में अगर ट्रंप झुक गए तो उन्हें इसका भारी खमियाजा उठाना पड़ सकता है। गौरतलब है कि अमेरिका-चीन के बीच यह कारोबारी जंग अगर लंबी चली तो दुनिया के लिए संकट पैदा करने वाली हो सकती है। पिछले चार दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति ने जिस तरह का रुख दिखाया है और जो बयान दिए हैं वे आसन्न खतरे का संकेत दे रहे हैं। हाल में दोनों देशों के बीच विवाद तब ज्यादा गंभीर हुआ जब अमेरिका ने चीन से होने वाले तीन सौ अरब डॉलर के आयात पर शुल्क दस से बढ़ा कर पच्चीस फीसद कर दिया और उस पर व्यापार वार्ता को नाकाम करने की तोहमत जड़ दी।

दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध की शुरुआत पिछले साल तब हुई थी जब अमेरिका ने चीन से आयात होने वाले इस्पात और अल्युमीनियम पर भारी आयात शुल्क लगाया था। जवाब में चीन ने भी ऐसा ही कदम उठाने में कोई देर नहीं की। अमेरिकी राष्ट्रपति इस बात पर जोर दे रहे हैं कि चीनी आयात के कारण अमेरिकी कारोबारियों को नुकसान हो रहा है और अमेरिका को पौने चार सौ अरब डॉलर सालाना का नुकसान उठाना पड़ रहा है, इसलिए इसकी भरपाई चीन से ही की जानी चाहिए। जब तक चीन अमेरिकी उत्पादों पर आयात शुल्क नहीं हटाता, तब तक अमेरिका भी नहीं टस से मस नहीं होने वाला। ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि चीन ने यह कदम अगले साल अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के मद्देनजर उठाया है, क्योंकि उसे लग रहा है कि वे दोबारा राष्ट्रपति नहीं बनने वाले।

चीन और अमेरिका भले अपने कारणों से लड़ रहे हों, लेकिन इस जंग से भारत अछूता नहीं रहने वाला। व्यापार युद्ध से उठने वाली आंच भारत को भी झेलनी पड़ सकती है। अगर दोनों पक्षों के बीच जल्द ही कोई पटरी नहीं बैठी तो अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ सकती हैं और इसका पहला असर यह होगा कि भारत से संस्थागत निवेशक निकल सकते हैं और शेयर बाजार लड़खड़ा सकते हैं। इसके अलावा, अगर यूरोपीय संघ (ईयू) ने भी अमेरिका के संरक्षणवाद के रास्ते पर चलने का फैसला कर लिया तो भारत से यूरोपीय देशों को होने वाले निर्यात पर असर पड़ सकता है। वैश्विक मंदी जैसे हालात बने तो कच्चा तेल महंगा होगा और सीधा असर पेट्रोल व डीजल के दामों पर पड़ेगा, महंगाई लोगों की कमर तोड़ेगी। हालांकि भारत ने हाल में चीन को ऐसे तीन सौ अस्सी उत्पादों की सूची दी है जो चीन खरीद सकता है। लेकिन चीन भारत से उन्हीं उत्पादों को खरीदने की तरजीह देगा जो उसे अमेरिका से नहीं मिल पाएंगे, जैसे दवाइयां और सोयाबीन, अलसी जैसे कृषि उत्पाद। पिछले साल अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले इस्पात और अल्युमीनियम पर भारी उत्पाद शुल्क लगा दिया था। इसके जवाब में भारत ने भी अमेरिका से खरीदे जाने वाले उनतीस उत्पादों पर शुल्क लगाया था। अमेरिका और चीन का यह झगड़ा कुल मिला कर वैश्विक कारोबारी स्थिति को प्रभावित करने वाला है। ऐसे में एहतियाती कदम उठाने में देरी भारत को भारी पड़ सकती है।

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