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खतरनाक इमारतें

पिछले कुछ समय के दौरान दिल्ली और आसपास के इलाकों में इमारतों के ढह जाने और उसमें लोगों के मारे जाने की कई घटनाएं सामने आईं। अमूमन हर बार यह सवाल उठा कि सरकार के जिन संबंधित महकमों की यह ड्यूटी है कि वे समय-समय पर इमारतों की जांच करके उनके खतरनाक या सुरक्षित होने को चिह्नित करें, वे क्या करती हैं!

Author January 8, 2019 4:03 AM
ग्रेटर नोएडा में ढही 6 मंजिला इमारत (फोटो-रॉयटर्स)

पिछले कुछ समय के दौरान दिल्ली और आसपास के इलाकों में इमारतों के ढह जाने और उसमें लोगों के मारे जाने की कई घटनाएं सामने आईं। अमूमन हर बार यह सवाल उठा कि सरकार के जिन संबंधित महकमों की यह ड्यूटी है कि वे समय-समय पर इमारतों की जांच करके उनके खतरनाक या सुरक्षित होने को चिह्नित करें, वे क्या करती हैं! यह समझना मुश्किल है कि जिन हादसों में काफी तादाद में लोगों की जान जाने की आशंका होती है, उनके बाबत सरकार और संबंधित महकमों की नींद तब तक नहीं खुलती, जब तक कोई बड़ी दुर्घटना न हो जाए। करीब छह महीने पहले ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी इलाके में एक छह मंजिला इमारत ढह गई थी, जिसमें कई मजदूरों की जान चली गई। उसके बाद शहर और आसपास के गांवों में बनी तीन मंजिल से ऊंची रिहायशी इमारतों की पहचान करके उन्हें असुरक्षित और जर्जर घोषित करने का अभियान चलाया गया था। लेकिन हालत यह है कि गांवों की आबादी में तीन से ज्यादा ऊंची मंजिल की करीब सवा तेरह सौ इमारतों की जांच अब भी पूरी नहीं हो सकी है। यही नहीं, इससे पहले निरीक्षण के बाद जिन करीब साढ़े सत्रह सौ बहुमंजिला इमारतों को असुरक्षित करार दिया गया था, उन पर प्रशासन या फिर संबंधित महकमों को कोई सख्ती बरतना जरूरी नहीं लगा। सवाल है कि अगर इस बीच कोई हादसा हो जाता है और उसमें लोगों की मौत होती है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?

यह किसी से छिपा नहीं है कि किसी भी इमारत के अचानक ढह जाने और उसमें लोगों की जान जाने के बाद जब प्रशासनिक लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया जाता है तो अमूमन हर बार यह आश्वासन दोहराया जाता है कि मामले की जांच कराने के साथ-साथ ऐसे हादसों से बचने के लिए खतरनाक स्थिति वाली इमारतों के मालिकों पर कार्रवाई की जाएगी, ताकि भविष्य में इस तरह की और घटना नहीं हो। लेकिन सच यह है कि इस तरह के दावों के कुछ ही समय बाद सरकार और उसके महकमों की कलई खोलते हुए कोई और इमारत अचानक ढह जाती है और उसमें नाहक ही लोग मारे जाते हैं। जाहिर है, मुख्य रूप से यह प्रशासन की ओर से बरती जाने वाली लापरवाही है कि खतरनाक हालत में पहुंच चुकी इमारतें आज जानलेवा साबित होने लगी हैं। ग्रेटर नोएडा में जिन इमारतों को अवैध घोषित किया गया था, उनके मालिकों ने रंगाई-पुताई करा कर अपने भवनों को होटल या रेस्तरां आदि चलाने के लिए किराए पर दे दिया है और अब भी उनसे मोटी कमाई कर रहे हैं। खुलेआम नियम-कायदों के उल्लंघन की इन गतिविधियों पर प्रशासन या प्राधिकरण की नजर क्यों नहीं जाती है या इसकी अनदेखी की क्या वजह हो सकती है?

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि इमारतों के ढहने के मुख्य कारणों में उनमें इस्तेमाल की गई घटिया सामग्री से लेकर उनके बहुत पुरानी या जर्जर होने और नियमों को धता बता कर मकान की कमजोर बुनियाद और उनका गलत डिजाइन होना शामिल हैं। जमीन और आसपास की रिहाइश के मुताबिक मकान का नक्शा और उसे बनाने तक के मामले में तय नियम-कायदों का पालन अनिवार्य है। इसकी निगरानी संबंधित महकमों और अधिकारियों की ड्यूटी है। लेकिन इमारतों के निर्माण के दौरान अधिकारियों के रिश्वत लेने की खबरें तो जब-तब आती रहती हैं, इमारतों के सुरक्षित होने के सभी नियमों का पालन सुनिश्चित करने या उनके अभाव में कार्रवाई को लेकर टालमटोल आम है। यह बेवजह नहीं है कि आए दिन इमारतों के अचानक ध्वस्त हो जाने और लोगों की नाहक मौत की घटनाएं रुक नहीं रही हैं।

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