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संपादकीय: राहत और चुनौती

सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को आसान बनाने की दिशा में बड़ी पहल के संकेत दिए हैं। प्रधानमंत्री ने मंगलवार को एक समारोह में कहा कि आम लोगों के उपयोग में आने वाली ज्यादातर चीजें अठारह फीसद वाले कर दायरे में कर दी जाएंगी। शनिवार को जीएसटी परिषद की बैठक में इस फैसले पर मुहर लगने उम्मीद है। अगर यह घोषणा जमीन पर उतरी तो जरूरी उपभोक्ता वस्तुओं को सस्ता करने की दिशा में इसे बड़ा कदम माना जा सकता है।

Author December 20, 2018 3:27 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (फाइल)

सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को आसान बनाने की दिशा में बड़ी पहल के संकेत दिए हैं। प्रधानमंत्री ने मंगलवार को एक समारोह में कहा कि आम लोगों के उपयोग में आने वाली ज्यादातर चीजें अठारह फीसद वाले कर दायरे में कर दी जाएंगी। शनिवार को जीएसटी परिषद की बैठक में इस फैसले पर मुहर लगने उम्मीद है। अगर यह घोषणा जमीन पर उतरी तो जरूरी उपभोक्ता वस्तुओं को सस्ता करने की दिशा में इसे बड़ा कदम माना जा सकता है। हालांकि सरकार को यह कदम बहुत पहले उठाना चाहिए था। जीएसटी के दायरे में शुरू से ही भारी विसंगतियां रही हैं। इस कारण तमाम सस्ती चीजें लंबे समय तक महंगे दाम पर बिकती रहीं। लेकिन तब इसकी जानबूझ कर अनदेखी इसलिए की जाती रही, ताकि सरकार अधिकतम राजस्व बटोर सके। इस जुलाई में भी जीएसटी परिषद ने कर श्रेणियों में बदलाव किया था और इसका असर कुछ उपभोक्ता वस्तुओं के सस्ता होने के रूप में सामने आया। अगर सरकार की पहल कामयाब होती है और जीएसटी परिषद में सहमति के आसार बन जाते हैं तो सबसे ऊंची अट्ठाईस फीसद दर वाली कर श्रेणी में मात्र तेरह वस्तुएं ही रह जाएंगी, जिनमें विमान, सिगरेट, शराब और एसयूवी वाहन आदि शामिल हैं। आम लोगों के लिए यह एक राहत भरा कदम हो सकता है, भले इसे चुनावों से जोड़ कर देखा जाए।

जीएसटी को जिस तरह बिना तैयारी के हड़बड़ी में लागू किया गया था, उसका देश के कारोबारी और उद्योग जगत में काफी विरोध हुआ था। यह हकीकत भी है कि आधे-अधूरे रूप में जीएसटी लागू करने से छोटे कारोबारियों पर सबसे ज्यादा मार पड़ी। जीएसटी की पेचीदगियों की वजह से कारोबारी इसे अपनाने को तैयार नहीं थे। लोगों पर असर यह पड़ा कि इसके लागू होते ही कई वस्तुएं पूर्व के मुकाबले महंगी हो गर्इं। इस वक्त सबसे ज्यादा छह सौ पांच वस्तुएं अठारह फीसद वाले कर दायरे में हैं, जबकि चौबीस फीसद कर दायरे में सैंतीस वस्तुएं रह गई हैं। जैसा कि प्रधानमंत्री ने अट्ठाईस फीसद वाले दायरे को और छोटा करने का भरोसा दिया है, अगर इसे परिषद की हरी झंडी मिल जाती है तो दुपहिया वाहन, कारें, सीमेंट, कंप्यूटर पैनल, पॉवर बैंक जैसे उत्पाद भी अठारह फीसद के दायरे में आ जाएंगे। इससे मंद पड़े वाहन और निर्माण उद्योग को थोड़ी राहत मिल सकती है। हालांकि दरों में कटौती परिषद के लिए आसान इसलिए नहीं होगी कि इसका सीधा असर उद्योगों पर पड़ेगा। इसके अलावा निम्न और मध्यम वर्ग के उपयोग वाली अधिकतम वस्तुएं अठारह फीसद कर के दायरे में हैं। विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि आठरह फीसद दर का बड़ा दायरा समस्या बन सकता है। ऐसे में कर दरों को तर्कसंगत बनाना जीएसटी परिषद के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।

देश में समान कर व्यवस्था लागू करने के मकसद से पिछले साल एक जुलाई से जीएसटी लागू किया गया था। सरकार का दावा है कि जीएसटी लागू होने के बाद पिछले डेढ़ साल में उसके राजस्व संग्रह में भारी बढ़ोतरी हुई है और इसके अमल में आई बाधाएं भी काफी कम हुई हैं। जीएसटी में पंजीकरण कराने वाले उद्यमों की संख्या भी एक करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है। इसमें कोई शक नहीं कि देश में समान कर व्यवस्था लागू करने की दिशा में यह बड़ा प्रयास एक हद तक तो सफल हो चुका है, लेकिन इससे हुई व्यावहारिक समस्याओं की घोर अनदेखी भी हुई है। सवाल है कि जीएसटी की जटिलता की वजह से जिन लोगों के काम-धंधे से चौपट हो गए हैं उनकी सुध कौन लेगा?

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