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प्रतिरक्षा में अनियमितता

रक्षा सौदों में अनियमितता के मामले कई बार उठते रहे हैं। मगर सैनिकों के लिए रसद की खरीद में रिश्वतखोरी को लेकर सीबीआई ने इधर जो दो मामलों में सैन्य अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की हैं, वैसा शायद पहले नहीं हुआ था। ताजा मामला अरुणाचल और असम में तैनात सैनिकों के लिए रसद की खरीद में ठेकेदारों से अठारह लाख रुपए घूस लेने का है।

Author January 4, 2019 4:20 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (Source: PTI)

रक्षा सौदों में अनियमितता के मामले कई बार उठते रहे हैं। मगर सैनिकों के लिए रसद की खरीद में रिश्वतखोरी को लेकर सीबीआई ने इधर जो दो मामलों में सैन्य अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की हैं, वैसा शायद पहले नहीं हुआ था। ताजा मामला अरुणाचल और असम में तैनात सैनिकों के लिए रसद की खरीद में ठेकेदारों से अठारह लाख रुपए घूस लेने का है। इससे पहले नगालैंड में रसद आपूर्ति के लिए ठेकेदार से करीब बयासी लाख रुपए घूस लेने का मामला दर्ज हुआ था। यों सैनिकों के लिए वर्दी, जूते, मच्छरदानी वगैरह की खरीद में घोटालों के मामले पहले भी उजागर हो चुके हैं, पर उनके घेरे में केंद्रीय स्तर पर तैनात रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों को ही लिया गया था। ताजा मामलों में सेना के कर्नल और लेफ्टिनेंट स्तर के अधिकारी और दूसरे कर्मचारी शामिल पाए गए हैं। सेना को आमतौर पर अनुशासित और ईमानदार महकमा माना जाता है, इसलिए उसके सैनिकों और अधिकारियों से दूसरे क्षेत्रों के अधिकारियों की तरह घूसखोरी आदि में शामिल होने की उम्मीद नहीं की जाती। पर ताजा घटनाओं ने इस धारणा को भंग किया है। इससे निस्संदेह सेना की साख पर भी आंच आई है।

सैनिकों के लिए रसद और रोजमर्रा जरूरतों के सामान की खपत बड़े पैमाने पर होती है। उन्हें सस्ती दर पर चीजें उपलब्ध कराने के लिए कैंटीन खुली हुई हैं। इनमें थोक में वस्तुओं की आपूर्ति होती है। इसलिए लगभग हर वस्तु के आपूर्तिकर्ता की कोशिश होती है कि उसे सेना के लिए चीजें पहुंचाने का ठेका मिल जाए। हालांकि वस्तुओं की खरीद के लिए सेना में काफी पारदर्शिता बरतने का दावा किया जाता है। इसके लिए कड़े नियम-कायदे हैं। पर दबी जुबान ऐसी बातें लंबे समय से होती रही हैं कि कैंटीन और सैनिकों को सीधे मुहैया कराई जाने वाली सामग्री की खरीद में बड़े पैमाने पर कमीशनखोरी होती है। चूंकि सेना की कैंटीन में चीजें खुले बाजार की अपेक्षा काफी कम कीमत में मिल जाती हैं, इसलिए कुछ साल पहले तक यह प्रवृत्ति भी आम थी कि सैनिक अपने नाम पर चीजें खरीद कर अपने रिश्तेदारों, परिजनों, दोस्तों आदि को पहुंचाया करते थे। इस पर रोक लगाने के लिए स्मार्ट कार्ड बनाए गए और हर कर्मचारी का कोटा तय कर दिया गया। इस तरह अनाप-शनाप खरीद पर कुछ हद तक अंकुश लगाया जा सका। पर वस्तुओं की आपूर्ति में चूंकि खरीद संबंधी अधिकारियों के जिम्मे काफी कुछ डाल दिया गया है, उन्हें ठेकेदार प्रभावित करने का प्रयास करते हैं।

इस तरह की अनियमितता से जाहिर है, ठेकेदार आपूर्ति में वस्तुओं की गुणवत्ता आदि का समुचित ध्यान नहीं रखते। वे अपने मुनाफे का ध्यान रखते हुए हल्की गुणवत्ता वाली चीजों की आपूर्ति कर देते हैं। चूंकि संबंधित अधिकारी ठेकेदारों के प्रभाव में होते हैं, इसलिए वे गुणवत्ता आदि की तरफ से आंखें फेरे रहते हैं। कई बार युद्ध के समय पहाड़ों पर तैनात सिपाहियों के पास माकूल गुणवत्ता के कपड़े, जूते आदि न होने से उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होने की बातें उठती रही हैं, फिर भी अगर इस तरफ गंभीरता से ध्यान देने के बजाय आपूर्ति में घूसखोरी जैसी प्रवृत्ति बनी हुई है, तो यह सैनिकों के प्रति घोर लापरवाही है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि खराब गुणवत्ता की चीजें खाने, घटिया कपड़े-जूते पहनने से उनकी सेहत और प्रदर्शन पर कैसा असर पड़ता होगा। इसलिए सेना के लिए रसद आदि की खरीद प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की जरूरत है।

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