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संपादकीय: बंजर होती धरती

यदि जंगल नहीं होंगे तो आकाश में कार्बन डाइआक्साइड की एक सघन परत जम जाएगी। इससे धरती का तापमान बढ़ जाएगा जिससे सबसे बड़ा और ज्यादा खतरा हिमालयी क्षेत्र को होगा। वैश्विक तापमान बढ़ने से हिमालय पर जमी बर्फ भी पिघल रही है। आज जिस तरह धरती का तापमान बढ़ रहा है, उससे ध्रुवों तक की बर्फ पिघल रही है और समुद्रों का जलस्तर बढ़ता जा रहा है।

Author Published on: September 12, 2019 1:36 AM
सांकेतिक तस्वीर।

निरंकार सिंह

दुनिया भर में जमीन के बंजर होकर रेगिस्तान में बदलने के कारण धूल भरे तूफान और सूखे, भारी वर्षा और बाढ़ की समस्या आज मानव जाति के सामने सबसे बड़ा संकट है। इस संकट का समाधान खोजने के लिए संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में एक सौ चौरानवे देशों के पर्यावरण मंत्रियों का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (कॉप-14) भारत में हो रहा है। इसमें मौजूद प्रतिनिधि भू क्षरण रोकने के लिए अगले दो साल के अपने-अपने लक्ष्य तय करेंगे। यह अब तक सबसे बड़ा सम्मेलन है। जलवायु परिवर्तन वैश्विक समस्या है और इसका प्रभाव भी वैश्विक है। इसमें अंतरराष्ट्रीय अनुभव विभिन्न देशों के लिए मददगार साबित होंगे। संयुक्त राष्ट्र के ही आंकड़ों के सहारे समझने की कोशिश की जाए तो इस पृथ्वी पर पचहत्तर फीसद जमीन की क्षति हो चुकी है। अगले तीस सालों यानी 2050 तक अनुमान है कि यह बढ़ कर नब्बे फीसद तक हो सकती है।

पूरी दुनिया में उष्णकटिबंधीय जंगल दो करोड़ हेक्टेयर अर्थात आधे कैलिफोर्निया के बराबर हर साल की रफ्तार से नदारद हो रहे हैं। कैलिफोर्निया अमेरिका के सबसे बड़े प्रदेशों में एक है। अगले लगभग तीस सालों में सारे उष्णकटिबंधीय जंगल नष्ट हो जाएंगे। अमेजन के जंगलों में जिस तरह से आग बढ़ रही है, उसे देखते हुए तो ये जंगल और जल्दी नष्ट हो जाएंगे। इसके परिणाम भयावह होंगे, क्योंकि इन जंगलों से हमें सांस लेने के लिए आक्सीजन मिलती है। पर ये जंगल जिस रफ्तार से साफ हो रहे हैं, उससे मानव जाति को समझ में नहीं आ रहा है कि आक्सीजन कैसे मिलेगी? इसके अलावा हमारे तमाम कल कारखानों, मोटर गाड़ियों, यंत्रों और मानव एवं पशुओं की सांसों से जो कार्बन डाइआक्साइड निकलती है, उसे ये जंगल पी जाते हैं। यदि जंगल नहीं होंगे तो आकाश में कार्बन डाइआक्साइड की एक सघन परत जम जाएगी। इससे धरती का तापमान बढ़ जाएगा। और इससे सबसे बड़ा और ज्यादा खतरा हिमालयी क्षेत्र को होगा।

वैश्विक तापमान बढ़ने से हिमालय पर जमी बर्फ भी पिघल रही है। आज जिस तरह से धरती का तापमान बढ़ रहा है, उससे ध्रुवों तक की बर्फ पिघल रही है और समुद्रों का जलस्तर बढ़ता जा रहा है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आने वाले दशकों में तो समुद्र का जलस्तर इस खतरनाक स्तर तक ऊपर उठ जाएगा कि ज्यादातर तटवर्तीय क्षेत्र और शहर उसमें जलमग्न हो सकते हैं। न्यूयार्क, लंदन, सान फ्रांसिस्को, एम्सटर्डम, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे बड़े-बड़े महानगरों पर यह संकट ज्यादा है।

नेपाल ने अपने जंगल रूस को बेच दिए हैं। रूस इन जंगलों को कुल्हाड़ी से नहीं काट रहा है, बल्कि आधुनिक तकनीक से काट रहा है जिससे एक दिन में हजारों वृक्ष खत्म हो जा रहे हैं और मीलों लंबी जमीन रेगिस्तान बनती जा रही है। ये वृक्ष हिमालयी नदियों को प्रचंड वेग से बहने से रोकते थे। लेकिन अब ये वृक्ष विदा हो गए हैं। नदियां इतने वेग से बहती हैं कि सागर उतनी तेजी से उन्हें आत्मसात नहीं कर पाता। इससे बांग्लादेश को साल में न जाने कितनी बार भयंकर बाढ़ का सामना करना पड़ता है। इससे बड़े हिस्से में फसलें चौपट हो जाती हैं। लाखों लोग बेघर हो जाते हैं। बांग्लादेश जैसे गरीब मुल्क के लिए यह कम गंभीर संकट नहीं है।

नेपाल से यह कहना कि ये पेड़ मत काटो, उसकी शक्ति से बाहर है। अब यदि नेपाल इन वृक्षों को काटना रोक दे, तो भी नुकसान तो हो ही चुका है। पर नेपाल इन वृक्षों को कटने पर रोक नहीं लगा सकता। उसने उन्हें आने वाले तीस वर्षों के लिए इन्हें बेच डाला है। वह इनके बदले पैसे ले चुका है ताकि वह जीवित रह सके। इस तरह की परिस्थिति दुनिया के अनेक इलाकों में है। दुनिया की आबादी जिस रफ्तार से बढ़ रही है, वह पंद्रह वर्षों में लगभग तीस से चालीस फीसद बढ़ जाएगी।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि प्रतिवर्ष साठ लाख हेक्टेयर कृषि योग्य और चराऊ जमीन बंजर जमीन में परिवर्तित हो रही है और सालाना दो करोड़ हेक्टेयर जमीन की उत्पादकता शून्य हो रही है। सैकड़ों पौधे और जानवरों की जातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। विकासशील देशों में प्रतिवर्ष पंद्रह-बीस लाख लोग कीटाणुनाशक दवाइयों के जहर से पीड़ित होते हैं और कीटाणुनाशक दवा के कारण होने वाली मौतों की संख्या का अनुमान दस हजार सालाना का है।

हमारे कारखानों और वातानुकूलित संयंत्रों से कई तरह की गैसें पैदा होती हैं, जिनके घातक परिणाम देखने को मिले हैं। ये गैसें ओजोन परत को भारी नुकसान पहुंचा रही हैं। ओजोन की परत ऑक्सीजन का ही एक प्रकार है और जो पृथ्वी को बीस मील की ऊंचाई पर घेरे हुए है। यह ओजोन धरती के प्राणियों और वनस्पतियों के लिए नितांत आवश्यक है, क्योंकि यह सूरज से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों को रोक लेती है। अब हमारे कारखानों और उद्योगों द्वारा पैदा की जा रही गैसों ने इस ओजोन परत को छेद डाला है।

इस संकट का असर भारत पर भी पड़ रहा है। देश की कुल मरुस्थल भूमि का बयासी फीसद हिस्सा केवल आठ राज्यों में है। इनमें राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, झारखंड, ओड़िशा, मध्यप्रदेश और तेलंगाना शामिल हैं। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में किए गए एक अध्ययन में चिंताजनक परिणाम सामने आए हैं। इससे देश में एक विशाल कृषि क्षेत्र बंजर भूमि में बदल रहा है। इसमें पाया गया है कि वर्ष 2011 से 2013 के बीच आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में इन राज्यों के कुल भौगोलिक क्षेत्र का क्रमश: 14.35, 36.24 और 31.40 प्रतिशत भूभाग धरती को बंजर बनाने वाली प्रक्रियाओं से प्रभावित हुआ है।

आंध्र प्रदेश में भूमि को बंजर बनाने में सबसे बड़ा कारण पेड़-पौधों और अन्य वनस्पतियों में गिरावट होना है। इसके अलावा जमीन के बंजर होने में जल के कारण मिट्टी का कटाव और जलभराव जैसी प्रक्रियाएं भी उल्लेखनीय रूप से जिम्मेदार पाई गई हैं। कर्नाटक में भूमि को बंजर बनाने में पानी से मिट्टी का कटाव सबसे अधिक जिम्मेदार पाया गया है। इसके अलावा वनस्पतियों में कमी और लवणीकरण भी इसके लिए जिम्मेदार है।

इस दौरान रिमोट सेंसिंग से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में बंजर हो रही भूमि की वर्तमान स्थिति दर्शाने वाले मानचित्र तैयार किए गए हैं और इन इलाकों की जमीन में हुए बदलावों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। प्राकृतिक संसाधनों के खराब प्रबंधन और प्रतिकूल जैव-भौतिक और आर्थिक कारकों के कारण दक्षिणी राज्यों की उपजाऊ भूमि का एक बड़ा हिस्सा पिछले कुछ वर्षों में बंजर हुआ है। भूमि विशेष का अत्यधिक दोहन, मिट्टी के गुण, कृषि के तरीके, औद्योगीकरण, जलवायु और अन्य पर्यावरणीय कारक जमीन को बंजर बनाने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार होते हैं।

नागपुर स्थित राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो और इसके बंगलुरु केंद्र और अमदाबाद स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए भूमि सर्वेक्षणों में ये तथ्य उजागर हुए हैं। भूमि के बंजर होने से उसका प्रतिकूल प्रभाव मिट्टी की उर्वरता, स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र और आजीविका पर पड़ता है। इसकी कई वजहें होती हैं जिनमें जलवायु परिवर्तन और इंसानी गतिविधियां प्रमुख हैं। इसे हम चाहे तो रोक सकते हैं। इसके लिए सबसे पहले हमें पानी की हर बंूद को पकड़ कर अपने जल स्रोतों को समृद्ध करना होगा। हम हर छत, हर फुटपाथ से वर्षा जल का संचयन कर सकते हैं। हम जैसी दुनिया चाहते हैं उसी हिसाब से अपने को ढालना होगा।

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