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संपादकीय: बिगड़ती हवा

चिंता की बात यह है कि इस बार पराली जलाने की घटनाएं कम होने के बजाय और बढ़ी हैं।

Author Published on: October 15, 2019 1:20 AM
पराली जलाने की घटनाओं की सांकेतिक तस्वीर

राजधानी दिल्ली की हवा फिर खराब हो रही है। हर साल की तरह यह चेतावनी मिलनी शुरू हो गई है। वायु प्रदूषण लंबे समय से दिल्ली की बड़ी समस्या बना हुआ है, लेकिन अक्तूबर-नवंबर के महीने में यह समस्या उस वक्त ज्यादा गंभीर रूप धारण कर लेती है जब पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के खेतों में पराली जलाने से होने वाला धुआं दिल्ली के आसमान पर परत बन कर छा जाता है। यह हर साल की समस्या है। इससे दिल्ली की आबादी का बड़ा हिस्सा सांस और फेफड़े की बीमारियों का शिकार होता है और लोग अस्पतालों की ओर भागने को मजबूर होते हैं। लेकिन इतना सब कुछ होने और झेलने के बाद भी अगर पराली जलाने पर रोक नहीं लग पा रही है तो यह केंद्र और राज्य सरकारों की असफलता ही मानी जाएगी।

पराली जलाने के मसले पर पिछले तीन साल में सुप्रीम कोर्ट तक ने कड़े निर्देश दिए, पर्यावरण मंत्रालय की निगरानी में टीमें बनार्इं जो पराली जलाने के विकल्प खोजे और राज्य सरकारों को पराली जलाने वाले किसानों पर कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दिए, पर इन सबका कोई ठोस नतीजा अब तक सामने आया नहीं है।

चिंता की बात यह है कि इस बार पराली जलाने की घटनाएं कम होने के बजाय और बढ़ी हैं। हालांकि केंद्र और पंजाब सरकार की ओर से दावे किए जा रहे हैं कि पराली जलाने की घटनाओं में कमी आ रही है। लेकिन पंजाब सरकार के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक इस बार बारह अक्तूबर तक पंजाब में पराली जलाने की छह सौ तीस घटनाएं दर्ज की गई हैं। जबकि पिछले साल इसी अवधि में चार सौ पैंतीस मामले दर्ज हुए थे। हरियाणा में कई जगह पराली जलाई जा रही है।

दरअसल, किसानों के सामने मजबूरी यह है कि पराली जलाएं नहीं तो करें क्या! किसानों को पराली नष्ट करने का विकल्प सुझाने में सरकारें नाकाम रही हैं। जबकि दावे तो ये किए जा रहे हैं कि कई जगहों पर पराली कटवा कर बिकवाई जा रही है, लेकिन अगर ऐसा है भी तो बहुत ही कम जगहों पर। ज्यादातर किसानों के समक्ष आज भी पराली जलाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है।

पिछले साल पंजाब सरकार ने किसानों को पराली नष्ट करने की मशीनें देने की योजना बनाई थी, लेकिन ज्यादातर किसान गरीब हैं और वह योजना इनके लिए निरर्थक साबित हुई। ऐसे में पराली का किया क्या जाए, किसी को समझ नहीं आ रहा। देश में कृषि विशेषज्ञों की कमी नहीं है, कृषि विश्वविद्यालयों से लेकर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद जैसे बड़े वैज्ञानिक संस्थान हैं, लेकिन पराली का धुआं न निकले, इसका इलाज कोई नहीं कर पा रहा। यह पराली जलाने से ज्यादा चिंताजनक है।

हाल में अमेरिकी अंतरिक्ष एजंसी नासा ने पंजाब के खेतों में जलती पराली की तस्वीरें जारी की थीं। हालांकि पंजाब सरकार का तर्क है कि धुआं सिर्फ पराली का नहीं है, इसमें कचराघरों और श्मशानों से उठने वाला धुआं भी शामिल है। दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण रोकने के लिए थोड़े-बहुत जो प्रयास हुए हैं उनका कुछ असर दिखा भी है। लेकिन व्यापक स्तर पर जिस कवायद की जरूरत है वह दिखाई नहीं देती।

सबसे बड़ी समस्या सड़कों पर अभी भी पंद्रह साल से ज्यादा पुराने डीजल वाहनों का दौड़ना है। आज भी ऐसे वाहनों की संख्या लाखों में है। लेकिन सरकार ऐसे वाहनों पर रोक लगाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। इसके अलावा दिल्ली के कुछ खास इलाकों को छोड़ दें तो अनेक जगहों पर कचरा जलते देखा जा सकता है। सरकार अपने स्तर पर कदम तो उठा रही है, लेकिन लोगों को जागरूक करना ज्यादा बड़ी चुनौती साबित हो रही है।

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